हर सियासी दल की चाह..दलित वोट

हर पांच साल बाद या कभी उससे पहले हर दल, हर प्रत्याशी इन दलितों को उत्थान की वादे करता है। अगर 64 साल से ईमानदारी से उत्थान हो रहा होता तो इस वर्ग का पिछड़ापान आज खत्म हो गया होता। दलितों को लेकर अफसरशाही या फिर नेताओं की कार्यप्रणाली पर नजर डालें तो बात सिर्फ काम चलाने और इस तबके को लुभाने की ही देखने को मिलती है। प्रदेश में कुल आबादी में 21.15 प्रतिशत दलित हिस्सेदारी है। इनमें अधिकतर ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करते हैं। सीतापुर, हरदोई, इलाहाबाद, आजमगढ़, उन्नाव, रायबरेली, खीरी, गोरखपुर, जौनपुर, आगरा, लखनऊ, बाराबंकी, सुल्तानपुर, कानपुर नगर और बिजनौर जिले ऐसे हैं जहां दलितों की संख्या अधिक है।
इसी के चलते सभी राजनीतिक दलों का ध्यान इनकी ओर अधिक रहता है। दलितों का राजनीतिक स्तर पर उत्थान करने के लिए पहले ही कुल सीटों में से कुछ सीटें निर्धारित कर दी गई हैं। वर्तमान चुनावों में सूबे की 403 विधानसभा सीटों में से 85 अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हैं। सपा और भाजपा ने तो इन्हीं 85 सीटों पर ही दलित उम्मीदवार उतारे हैं, लेकिन बसपा और कांग्रेस ने अन्य जगहों पर भी इस तबके पर विश्र्वास दिखाया है। दोनों ने क्रमश: 88 और 87 प्रत्याशी मैदान में उतारे हैं।
यूपी के दलित बाहुल्य जिले
जिला दलित आबादी
सीतापुर 1153626
हरदोई 1065848
इलाहाबाद 1065097
आजमगढ़ 1013801
उन्नाव 827255
रायबरेली 856749
खीरी 820359
गोरखपुर 831070
जौनपुर 857883
आगरा 788394
लखनऊ 776502
बाराबंकी 718897
सुलतानपुर 715297
कानपुर नगर 685809
बिजनौर 655806












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