यूपी विस चुनाव: छोटे दल, बड़ी महत्वाकांक्षाएं

लखनऊ। उत्तर प्रदेश में 80 के दशक के बाद से जातिवादी राजनीति के परवान चढ़ने के साथ ही सियासी महत्वाकांक्षाएं लेकर जन्म लेने वाले छोटे दलों की संख्या में निरंतर बढ़ोत्तरी हुई है, हालांकि एकाध मौकों को छोड़कर वे राजनीतिक समीकरणों पर कोई खास असर डालने में सफल नहीं रहे हैं। पंजीकृत लेकिन गैर मान्यता प्राप्त दलों के चुनाव मैदान में उतरने की शुरुआत वर्ष 1962 में हुए राज्य के तीसरे विधानसभा चुनाव में दलित आधारित राजनीति करने वाली रिपब्लिकन पार्टी और दक्षिणपंथी विचारधारा वाली हिन्दू महासभा एवं राम राज्य परिषद के मैदान में उतरने के साथ हुई। तब रिपब्लिकन पार्टी को आठ सीटें मिली थीं और हिन्दू महासभा को दो जबकि राम राज्य परिषद खाली हाथ रह गयी थी।

किसी गैर मान्यता प्राप्त पंजीकृत राजनीतिक दल को पहली और प्रभावी कामयाबी वर्ष 1969 के चुनाव में चौधरी चरण सिंह की अगुवाई वाले भारतीय क्रांतिदल को मिली, जो 98 सीटों पर जीत दर्ज करने के साथ राज्य की 425 सदस्यीय विधानसभा में कांग्रेस के बाद सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। सूबे में जातिवादी राजनीति की शुरुआत रिपब्लिकन पार्टी ने की थी। शुरुआत में उसे थोड़ी कामयाबी भी मिली लेकिन आगे चलकर उसका कांग्रेस में विलय हो जाने के बाद इस रंग-ओ-बू की सियासत करीब डेढ़ दशक तक खामोश रही। वर्ष 1985 में बहुजन समाज पार्टी के प्रादुर्भाव और उसकी सफलता ने जाति विशेष में थोड़ा-बहुत प्रभाव रखने वाले सियासी लोगों का मनोबल बढ़ाया और अपना दल, राष्टीय स्वाभिमान पार्टी, इंडियन जस्टिस पार्टी तथा लोक जनशक्ति पार्टी के गठन के साथ जातिवाद की लहलहाती फसल को काटने के लिये सियासी दल बनाने का सिलसिला चल निकला।

राज्य के आगामी विधानसभा चुनाव में पीस पार्टी, अपना दल और इंडियन जस्टिस पार्टी जैसे कुछ प्रभावशाली दल रणनीति बदलते हुए समान विचारधारा वाली कई पार्टियों के साथ गठबंधन करके मैदान मारने की फिराक में हैं। प्रदेश में राम मंदिर आंदोलन की शुरुआत के बाद धर्म आधारित राजनीति करने वाले दलों का भी उभार शुरू हुआ और इस मैदान में शिवसेना और उलमा कौंसिल जैसे दलों ने भी किस्मत आजमाने की कोशिश की और पिछले लोकसभा चुनाव में कुछ अंचलों में प्रभाव के साथ उभरी डाक्टर अयूब की पीस पार्टी को भी इसी मैदान का खिलाड़ी माना जा रहा है, हालांकि इसके पदाधिकारियों में लगभग सभी जातियों और धर्मो के अनुयायी शामिल हैं।

प्रदेश के चुनावी इतिहास पर नजर डालें तो पाएंगे कि वर्ष 1985 के बाद से चुनाव मैदान में छोटे दलों की संख्या लगातार बढ़ी है। साल 1985 में जहां सिर्फ दो गैर मान्यता प्राप्त पंजीकृत पार्टियों ने चुनाव लड़ा था, वहीं वर्ष 2007 में हुए पिछले विधानसभा चुनाव में छोटे दलों की तादाद 111 तक पहुंच गयी। चुनाव आयोग की रिपोर्टों के मुताबिक वर्ष 1952, 1957 और 1967 में विधानसभा चुनाव में किसी भी गैर मान्यता प्राप्त पंजीकृत दल ने चुनाव नहीं लड़ा। वर्ष 1962 के विधानसभा चुनाव में हिन्दू महासभा, रिपब्लिकन पार्टी और राम राज्य परिषद नामक गैर मान्यता प्राप्त पंजीकृत दलों ने कुल 237 उम्मीदवारों को चुनाव मैदान में उतारा।

इनमें से रिपब्लिकन पार्टी को आठ जबकि हिन्दू महासभा को दो सीटें मिलीं जबकि राम राज्य परिषद की झोली खाली रही। इन छोटी पार्टियों को कुल 5.09 प्रतिशत वोट मिले। वर्ष 1974 के विधानसभा चुनाव में 15 छोटी पार्टियों ने कुल 368 उम्मीदवार उतारे जिनमें से 360 की जमानत जब्त हो गयी और सिर्फ दो उम्मीदवारों की ही चुनावी वैतरणी पार लग सकी। इस चुनाव में छोटे दलों को मात्र 2.18 प्रतिशत वोट मिले। साल 1969 के विधानसभा चुनाव में 16 छोटे दलों के 658 प्रत्याशियों ने चुनाव लड़ा जिनमें से 100 ने कामयाबी हासिल की। उनमें से चरण सिंह की अगुवाई वाले भारतीय क्रांतिदल ने 402 सीटों पर चुनाव लड़कर 98 सीटें जीत लीं। उस चुनाव में छोटे दलों के हिस्से में कुल 23.41 फीसद वोट आए। हालांकि इससे प्रमुख पार्टियों के मतों पर कोई खास प्रभाव नहीं पड़ा और कांग्रेस ने 425 में से 211 सीटें जीतकर आसानी से सरकार बनाई। वर्ष 1977 के चुनाव में सात छोटी पार्टियों ने 111 उम्मीदवार उतारे जिनमें से 110 की जमानत जब्त हो गयी। इन चुनाव में ये दल खाली हाथ रहे और उनका वोट प्रतिशत 0.77 फीसद रहा।

वर्ष 1980 के विधानसभा चुनाव में सात छोटे दलों के 60 उम्मीदवारों में से एक जीतने में कामयाब रहा जबकि 58 की जमानत जब्त हो गयी। इन दलों के प्रत्याशियों का कुल वोट प्रतिशत 0.45 प्रतिशत रहा। वर्ष 1985 के चुनाव में दो पार्टियों ने कुल 354 सीटों पर चुनाव लड़ा जिनमें से सभी सीटों पर उनके प्रत्याशी अपनी जमानत भी नहीं बचा सके। वर्ष 1989 के चुनाव में 31 छोटे दलों ने कुल 936 उम्मीदवार खड़े किये जिनमें से सिर्फ 15 ही जीत हासिल कर सके और उनका वोट प्रतिशत 11.36 प्रतिशत रहा। यह वह दौर था जब कांग्रेस ने एकछत्र राज किया। राज्य में उसके पतन के बाद छोटे दलों की संख्या में बढ़ोत्तरी हुई और उनकी भूमिका महत्वपूर्ण होती गयी।

वर्ष 1993 में 59 छोटे दलों के कुल 1205 प्रत्याशियों ने चुनाव लड़ा जिनमें से 110 ने जीत हासिल की। उस वक्त मुलायम सिंह यादव की अगुवाई वाले गैर मान्यता प्राप्त पंजीकृत दल समाजवादी पार्टी ने 109 सीटें जीती थीं। उस चुनाव में छोटे दलों का कुल वोट प्रतिशत 19.42 प्रतिशत रहा। वर्ष 1991 के विधानसभा चुनाव में 34 छोटे दलों ने कुल 645 उम्मीदवार खड़े किये जिनमें से सिर्फ दो जीत सके और 641 की जमानत जब्त हो गयी। उनका वोट प्रतिशत । .09 रहा। वर्ष 1996 के विधानसभा चुनाव में 61 छोटे दलों ने कुल 1102 उम्मीदवारों को खड़ा किया जिनमें से 11 ही जीत सके। इस तरह उनका वोट प्रतिशत 5.63 रहा।

वर्ष 2002 के विधानसभा चुनाव में 58 छोटी पार्टियों ने 1332 प्रत्याशी उतारे जिनमें से 29 ने जीत हासिल की। चुनाव में इन पार्टियों का कुल मत प्रतिशत 12.34 रहा। वर्ष 2007 के विधानसभा चुनाव में सबसे ज्यादा 111 छोटे दलों ने चुनाव में हिस्सा लिया। इन पार्टियों ने कुल 1356 प्रत्याशी उतारे जिनमें से सिर्फ सात जीते और 1329 की जमानत जब्त हो गयी। इन दलों का वोट प्रतिशत 6.37 रहा। प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनाव में करीब 300 छोटे दल ताल ठोंक रहे हैं जो प्रदेश में जातिवादी राजनीति की जड़ों की गहराई की तरफ इशारा करता है।

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