अवाम अंगूठा छाप, एमएलए फेसबुक पर

अंकुर कुमार श्रीवास्‍तव

'तालीम के एतबार से अवाम बदकिस्‍मत है लेकिन उनके नुमाइंदे खुशकिस्‍मत'। दोनों की तालीमी हैसियत में जमीन और आसमान का फर्क है। अवाम बेहद पिछड़ा है मगर उनके एमएलए लैपटॉप और इंटरनेट से लैस हैं। इतना ही नहीं वह फेसबुक पर भी सक्रिय हैं। जी हां हम बात कर रहे हैं यूपी चुनाव में प्रत्‍याशियों द्वारा फेसबुक पर प्रचार प्रसार करने की। ज्‍यादा दूर नहीं जाते हैं, अभी हाल ही में सवर्णों और बुद्धिजीवियों की पार्टी कही जाने वाली भाजपा ने अपने प्रत्‍याशियों को लैपटॉप और इंटरनेट डाटा कार्ड देने की बात कही थी। मगर शायद वह यह भूल गई कि यूपी में अभी कई ऐसे क्षेत्र हैं जहां साक्षरता नाम मात्र की है।

अपनी बात को स्‍पष्‍ट करने के लिये भाजपा तो महज एक उदाहरण थी। हर पार्टी इसी ढर्रे पर है। प्रत्‍याशियों ने चुनावी वादों की मोटी-मोटी किताबें तो छपवा ली हैं लेकिन इसमें शिक्षा का पन्ना शामिल नहीं है। जर्जर भवनों में बच्चे जान जोखिम में डालकर पढ़ते हैं। कापी-किताबें नसीब नहीं हो रही। मिड-डे मील के नाम पर मासूमों को घटिया भोजन दिया जाता है। माध्यमिक स्कूलों में प्रयोगशालाएं उखड़ चुकी हैं, विद्यार्थियों के शारीरिक विकास हेतु खेलकूद की सुविधा तक नहीं हैं। विश्वविद्यालयों में शैक्षिक कार्यक्रमों से संबंधित ढांचा नहीं है।

निशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 के रूप में केंद्र सरकार ने एक महत्वाकांक्षी योजना शुरू की लेकिन उम्मीद की रोशनी उदासीनता की काली छाया दूर नहीं कर सकी। साक्षरता एवं शिक्षित प्रदेशों की तुलना में उत्तर प्रदेश बिल्कुल पिछड़ता जा रहा है फिर भी शिक्षा की डूबती नैया को बचाने के लिए जनप्रतिनिधियों के पास कोई योजना नहीं है। शायद चाय के होटलों और सड़क पर भीख मांगते बच्चों की ओर भी इनकी नजर नहीं पहुंचती।

अब जनपद बरेली को ही ले लीजिए। जनपद बरेली के मीरगंज विधानसभा क्षेत्र से विधायक सुल्‍तान बेग पंतनगर विश्‍वविद्यालय से बीएससी हैं। वह जिस ब्‍लॉक में रहते हैं वहां उस जनपद के सबसे कम पढ़े लिखे लोग बसते हैं। विधानसभा में दो बार पहुंचने के बाद बेग अब हैट्रिक की तैयारी में हैं। इस बार उन्‍होंने प्रचार के लिये फेसबुक का सहारा लिया है और अपने चुनावी मंसूबों को धड़ल्‍ले से फेसबुक पर अपडेट कर रहे हैं जबकि इस ब्‍लॉक में औसतन इक्का-दुक्का पढ़े-लिखे लोग हैं। ज्यादातरों कारोबार, खेती और मजदूरपेशा हैं।

यह तो अवाम और नुमाइंदों का एक छोटा किस्‍सा हमने आपके सामने पेश किया है। फिर सोचिए पूरे प्रदेश का क्‍या हाल है? अब आप ही बताइए विकास के नाम पर वोट मांगने वाले हमारे नेतागण किस आधार पर उत्‍तर प्रदेश को उत्‍तम प्रदेश बनाएंगे जबकि प्रदेश की रहने वाली जनता आधा से ज्‍यादा अगूंठा छाप है। इस बारे में आपका क्‍या कहना है? अपने विचार नीचे दिये कमेंट बॉक्‍स में दर्ज करें।

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