मुस्लिम आरक्षण पर उत्तर प्रदेश का जनमत
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों की तारीखों की घोषणा से ठीक दो दिन पहले कांग्रेस पार्टी ने मुसलमानों को ओबीसी के अंतर्गत आरक्षण दे दिया। विरोधी पार्टियों ने आरोप लगाया कि यह आचार संहिता का उल्लंघन है। और आनन-फानन में आकर चुनाव आयोग ने भी पांचों राज्यों में मुस्लिम आरक्षण पर रोक लगा दी। हालांकि बाद में यह मान लिया कि इसमें आचार संहिता का उल्लंघन नहीं हुआ है। इन सबके बीच बात अगर फायदे-नुकसान की करें, तो सभी पार्टियों के अलग-अलग चेहरे दिखाई देते हैं।
सबसे पहले बात कांग्रेस की करें, तो राहुल गांधी इस बात का डंका पीटने में जरा भी नहीं पीछे हैं। हालांकि आजमगढ़ में इसी वजह से उन्हें विरोध प्रदर्शन का भी सामना करना पड़ा था। चुनाव अभियान में वो बार-बार आरक्षण का मुद्दा उठाकर मुस्लिम वोट खींचने की पुरजोर कोशिश कर रहे हैं। समाजवादी पार्टी न तो इसका विरोध कर रहा है, और न ही समर्थन। कारण यह कि अगर विरोध किया तो उनका मुस्लिम वोट बैंक कमजोर पड़ जायेगा, और अगर विरोध किया तो यादव उनके खिलाफ खड़े हो सकते हैं। बहुजन समाज पार्टी का भी कुछ ऐसा ही हाल है।
वहीं भारतीय जनता पार्टी, जिसे मुस्लिम वोट मिलने की सबसे कम उम्मीद है, वो इस मामले को मुद्दा बनाने की हर संभव कोशिश कर रही है। भाजपा के नेता हर मंच पर यही कह रहे हैं कि कांग्रेस ने ओबीसी की सीटों को काट कर मुसलमानों को आरक्षण दिया है। भाजपा को ऐसा कहने में इसलिए भी गुरेज नहीं क्योंकि वो जानती है कि मुसलानों की ओर से सबसे कम वोट उसके खाते में आने वाला है। लिहाजा ऐसे भाषण देकर कम से कम ओबीसी वर्ग का वोटबैंक जरूर मजबूत किया जा सकता है।
वैसे मुस्लिम आरक्षण का यह मुद्दा इस समय यूपी में पूरी तरह छाया हुआ है। इसके झोके में मायावती की तमाम घोषणाएं और अखिलेश यादव के तमाम वादे दब से गये हैं। लिहाजा अगर इस फैक्टर को देखा जाये तो कुछ हद तक इस मुद्दे की वजह से कांग्रेस और भाजपा को फायदा मिल सकता है।













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