राज्यों की सत्ता तय करेगी केंद्र की राजनीति

अब हमारे सामने खर्चीले चुनाव आ रहे हैं। 6 मार्च तक इन चुनावों के नतीजे घोषित नहीं हो जाने तक राष्ट्रीय मुद्दों को बैकफुट पर कर दिया जाएगा। हर बार की तरह इस बार भी जातिगत वोटिंग की बात हो रही है पर इस बार बदलाव देखने को मिल सकते हैं।
बाकी 4 राज्य जहां चुनाव होने हैं वे उत्तराखंड, पंजाब, मणिपुर और गोवा हैं। इनकी तुलना उत्तर प्रदेश से की जाए तो यह उतने महत्वपूर्ण नहीं हैं। फिर भी यहां के चुनाव काफी अहम हैं। भारत में पिछले कुछ समय में काफी कुछ घटित हुआ है। अब लोगों की वोट करने की बार आई है। हर राज्य की अपनी व्यवस्था है और इन चुनावों से पूरे देश के बारे में अंदाजा लगाना मुश्किल है। इन चुनावों से इतना जरूर समझा जा सकता है कि लोग क्या सोच रहे हैं।
इन चुनावों में असली लड़ाई उत्तर प्रदेश में ही देखने को मिलेगी। अभी तक जो रिपोर्ट और अफवाहे हैं उसके आधार पर यह बात सामने आ रही है कि बसपा और सपा के बीच पहले स्थान के लिए कड़ा मुकाबला होगा और दोनों को 120 से 130 सीटें मिलने की उम्मीद है। इस आधार पर बीएसपी 2007 में हुए चुनावों की तुलना में लगभग 90 सीटें कम जीतती हुई दिखाई दे रही है। बीएसपी की इस हार पर सबकी नजर है। कांग्रेस और भाजपा तीसरी व चौथी जगह के लिए लड़ाई करेंगी। दोनों पार्टियां लगभग 75 सीटें जीतने की उम्मीद कर रही हैं ताकि वे तय कर सकें कि अगली सरकार किसकी बनेगी।
हालात अभी भी बदल सकते हैं। उत्तर प्रदेश में जातिगत वोटिंग का ही बोलबाला रहेगा। सभी पार्टियां उम्मीदवार तय करते समय इस बात का ध्यान रख रही है कि हर सीट पर सही उम्मीदवार उतारा जाए। इस बार एक-एक सीट के लिए लड़ाई देखने को मिलेगी।
चुनाव के नतीजे इस बात पर निर्भर होंगे कि वोटिंग किस आधार पर हुई है। राज्य में 4 पार्टियों के अलावा कई छोटी क्षेत्रीय पार्टियां भी मैदान में हैं। इस बार हार और जीत का अंतर बहुत कम रहने वाला है। ऐसे में जो पार्टी अपने समर्थन वाले वोटरों को वोटिंग बूथ तक लाने में कामयाब होगी उसकी जीत की दावेदारी मजबूत होगी।












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