कुशवाहा का गुमटी से हाथी और कमल तक का सियासी सफर
साधारण परिवार से ताल्लुक रखने वाले बाबू सिंह कुशवाहा राजनीति में ऊंचाइयां चढ़ने के साथ-साथ अमीरी भी बढ़ती गई। बांदा जिले के बबेरू तहसील के पखरौली गांव में कृषक परिवार से जुड़े कुशवाहा ने 1985 में स्नातक किया। इसके बाद उन्होंने अतर्रा में गुमटी लगाकरजीवन यापन शुरू किया। अप्रैल 1988 को वह बसपा संस्थापक कांशीराम के संपर्क में आ गए। कांशीराम ने उनको दिल्ली बुला लिया। कुशवाहा तो सियासी तकदीर आजमाने का ख्वाब लेकर दिल्ली गए थे, लेकिन कांशीराम ने उनको बसपा कार्यालय का कर्मचारी बना दिया।
दिल्ली के बसपा कार्यालय में 6 माह भी नहीं बीते होंगे कि उन्हें प्रोन्नत कर लखनऊ कार्यालय में संगठन का काम करने को भेजा गया। 1993 में सपा और बसपा के बीच गठबंधन हुआ तो बाबू सिंह को बांदा का जिलाध्यक्ष बनाया गया। इसके बाद मायावती ने उनको लखनऊ बुलाकर बसपा दफ्तर में टेलीफोन आपरेटर की जिम्मेदारी सौंपी। 1997 में उन्हें पहली बार विधान परिषद सदस्य के तौर पर बड़ा इनाम मिला। 2003 में भी बाबू को दोबारा विधान परिषद भेजा गया और जब तीसरी बार बसपा की सरकार बनी तो उन्हें पंचायती राज मंत्री बनाया गया।
2007 में बसपा पूर्ण बहुमत से सत्ता में आई तो बाबू सिंह को खनिज, नियुक्ति, सहकारिता जैसे महत्वपूर्ण विभाग मिले। जब परिवार कल्याण विभाग बना तो यह विभाग भी उन्हें सौंपा गया। इससे यह नए सिरे से साबित हो गया कि वह मायावती के सबसे विश्वसनीय नेता हैं। राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के जो करोड़ों रुपये सरकार खर्च नहीं कर पाती थी उस पर बाबूसिंह की नजर गई और फिर बंदरबांट का खेल शुरू हो गया।
राजधानी में दो सीएमओ की हत्या और जेल में एक डिप्टी सीएमओ की रहस्यमय तरीके से मौत के बाद कुशवाहा और स्वास्थ्य मंत्री अनंत मिश्रा ने 17 जुलाई 2011 को इस्तीफा दे दिया। 19 नवंबर को बाबू सिंह ने अपनी जान का खतरा बताकर बगावत कर दी और बसपा ने भी नौ दिन बाद उन्हें पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया। कांग्रेस और सपा का दरवाजा खटखटाने के बाद वह भाजपा में आ गए और उसके लिए मुसीबत तो बने ही, सियासी भूचाल का कारण भी बन गए।













Click it and Unblock the Notifications