न्यूक्लियर सुरक्षा पर निर्देश से सुप्रीम कोर्ट का इंकार

Supreme Court
दिल्ली (ब्यूरो)। सुप्रीम कोर्ट ने परमाणु संयंत्रों की निगरानी के लिए एक स्वतंत्र नियामक के गठन पर सरकार को निर्देश देने से इंकार करते हुए कहा कि इस अदालत को संसद में तब्दील नहीं किया जा सकता। शीर्ष अदालत ने इस मुद्दे को खुला रखा। उसने इस तरह के संयंत्रों के निर्माण के खिलाफ लोगों से कहा कि वे सार्वजनिक चर्चा के जरिए परमाणु सुरक्षा पर समाधान पेश करें। मुख्य न्यायाधीश एसएच कपाडि़या, न्यायमूर्ति एके पटनायक और न्यायमूर्ति स्वतंत्र कुमार की पीठ ने कहा कि वह इस तथ्य को लेकर सचेत है।

कोर्ट ने विशेषज्ञता के अभाव में सभी परमाणु संयंत्रों के सुरक्षा पहलुओं की पड़ताल पर आपत्ति जताई। पीठ ने कहा कि अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) पर दलील दी जा सकती है, लेकिन अन्य पहलुओं के लिए हम इस अदालत को संसद में तब्दील नहीं कर सकते। शीर्ष अदालत ने याचिकाकर्ताओं से कहा कि वह परमाणु सुरक्षा की निगरानी के लिए अमेरिका के साथ ही अन्य देशों द्वारा अपनाए गए मॉडलों को चार हफ्ते के भीतर पेश करें।

जब एनजीओ कॉमन कॉज और अन्य की ओर से अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने सुनवाई के दौरान लोकपाल विधेयक का जिक्र किया, तो पीठ ने कहा कि दोनों चीजों को न मिलाएं। जनहित याचिका में स्वतंत्र नियामक द्वारा सुरक्षा का आकलन करने तक देश में सभी प्रस्तावित परमाणु संयंत्रों का निर्माण रोकने की मांग की गई है। दलील के दौरान भूषण ने वैज्ञानिक ए गोपालकृष्णन द्वारा लिखे एक लेख का भी उल्लेख किया। गोपालकृष्णन परमाणु सुरक्षा विशेषज्ञ हैं और परमाणु सुरक्षा संधि की अध्यक्षता भी कर चुके हैं।

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