भारत के खुदरा बाजार की एक अनकही कहानी

बेंगलूरु। आपको याद होगा दो दशक पहले बेंगलुरु में एक रोड में हुए परिवर्तन ने भारत की अर्थव्‍यवस्‍था के हर चरण में उछाल ला दिया था। 1990 के मध्‍य में वापस जायें तो उस परिवर्तन के फर्स्‍ट फेज़ में देश के आईटी बूम से जोड़ने वाले हाईवे के रूप होसूर रोड का निर्माण किया गया। आज एक टोल आधारित एक्‍सप्रेसवे फ्लाईओवर और अंडरपास सीधे आकर उस बिंदु से मिलता है, जहां से शहर की शुरुआत होती है। वो है मडीवाला। कभी सूनसान पड़ा रहने वाला मडीवाला आज शहरी जंगल बन चुका है।

मडीवाला के दिल में भारतीय रीटेल यानी खुदरा बाजार की एक अनकही कहानी है। जिसका जिक्र आज जरूर किया जाना चाहिये, जब संसद में इसे लेकर इतना बड़ा हंगामा चल रहा है और देश के सभी राजनीतिक दल इसपर सर्वद‍लीय बैठक करने जा रहे हैं। आज यह चर्चा प्रासंगिक भी है। मडीवाला पुलिस स्टेशन से बहुत कम दूरी पर एक सब्‍जी मंडी है और हाल ही में विकसित की गई एक फीडर सड़क है। 19 नवंबर, 2011 में डेक्कन हेराल्ड ने एक लेख छापा था, जिसका शीर्षक था, "बाजार के लिए एक कूड़े का डिब्‍बा।"

मडीवाला वह बाजार है, जहां होसकोट और होसूर के खेतों से ताज़ा सब्जियां और साग लाये जाते हैं, आज इसे कचरे का डिब्‍बा की तरह कहा जा रहा है। मडीवाला पुलिस स्टेशन के पास स्थित इस बाजार में व्‍यापारी अच्‍छी सड़क और लोगों के लिए सार्वजनिक शौचालय बनाने की मांग करते रहे, लेकिन बीबीएमपी के अधिकारियों के कान में जू तक नहीं रेंगी।

जब बाजार के ठीक बगल में शॉपिंग मॉल और रोड का चौड़ीकरण शुरु हुआ तो विक्रेताओं ने खुद के साथ धोखा महसूस किया, क्‍योंकि बीबीएमपी ने रोड के लिए सब्‍जी मंडी का अधिकांश स्‍थान घेर लिया। व्‍यापारियों के पास इतनी कम जगह रह गई, कि उसी छोटी सी जगह में वो सब्‍जी बेचते हैं और वहीं पर कूड़ा फेंक देते हैं। मंडी का मौजूदा इन्‍फ्रास्‍ट्रक्‍चर पुराना है और काफी खराब भी। सभी विक्रेताओं को टूटी हुई स्लैब पर बैठना पड़ता है। यहां सड़कों पर चलना कठिन हो जाता है, क्‍योंकि रोज कूड़े के ढेर सड़क पर लग जाते हैं।

जो लोग मडीवाला को अर्से से जानते हैं, उनके लिए यह कहानी अपमानजनक से ज्‍यादा हास्यास्पद हो जाएगी।

1990 में आईटी सेक्‍टर में उछाल आने से पहले, उससे पहले जब यहां मॉल तक नहीं थे, जब फ्रीडर रोड नहीं थी और बेंगलुरु में रहने वाले लोग मडीवाला को जानते तक नहीं थे। तब बैंगलोर मुनिस्‍पल कने एक इमारत बनानी शुरु की, जिसका नाम था मडीवाला मार्केट कॉम्‍प्‍लेक्‍स। उस कॉम्‍प्‍लेक्‍स की खबरें द हिंदू ने अप्रैल 2003 में अच्‍छी तरह प्रकाशित की थीं।

कॉम्‍प्‍लेक्‍स के लिए पहला टेंडर 1987-88 में निकाला गया और मुनीवेंकटप्‍पा एंड संस को उसके ग्राउंड फ्लोर और फर्स्‍ट फ्लोर के निर्माण का ठेका मिला। कार्य 1990 में शुरू हुआ और 1992 में पूरा किया गया था।

1993 में, परिसर के दूसरे चरण में एक और मंजिल के निर्माण की बात चली और उसी कंपनी को निर्माण कार्य का ठेका दे दिया गया। कॉम्‍प्‍लेक्‍स में 114 दुकानें और 26 कार्यालयों का निर्माण 1994 में पूरा हो गया।

बाद में, 1996 में, सरकार ने मेगा सिटी परियोजना के तहत पांच और फ्लोर के निर्माण को मंजूरी दे दी। लेकिन अग्निशमन विभाग ने एनओसी देने से इनकार कर दिया और कहा कि एनओसी तब तक नहीं मिलेगी, जब तक कॉम्‍प्‍लेक्‍स के चारों तरफ मलिन बस्तियों को हटा नहीं दिया जाता। इस पूरी परियोजना के पूरा होने में एक दो साल की देरी हुई।

अब, बीएमपी को उम्‍मीद थी कि दुकानों और कार्यालयों की बिक्री से उसे 40 करोड़ रुपये तक की धनराशि मिलेगी। बीएमपी ने इस परियोजना में 50 करोड़ से अधिक खर्च किये थे। मडीवाला मार्केट कॉम्‍प्‍लेक्‍स का निर्माण 1992 में किया गया, लेकिन आज की तारीख तक एक भी दुकान पर कब्‍जा नहीं हुआ।

लोग आज तक नहीं समझ पाये हैं कि मडीवाला में इतने सालों में हुए परिवर्तन के बावजूद वो कॉम्‍प्‍लेक्‍स खाली क्‍यों पड़ा रहा। स्‍थानीय सरकार 9 साल से खाली पड़े इस कॉम्‍प्‍लेक्‍स में सब्‍जीमंडी को क्‍यों नहीं शिफ्ट कर पायी।

2003 और 2011 के बीच में देखते ही देखते वही मडीवाला शॉपिंग कॉम्‍प्‍लेक्‍स एक शॉपिंग मॉल में परिवर्तित हो गया। मॉल का नाम है टोटल मॉल, जिसे हम संगठित खुदरा बाजार का घर कहते हैं। जिस खुदरा बाजार पर हम गर्व करते हैं, वह आज भी उसी कूड़े के ढेर की तरह सड़क के किनारे चल रहा है।

मडीवाला से कुछ ही किलोमीटर आगे शहर के भीतर बढ़न पर भारत में संगठित खुदरा का असली गुनाह मौजूद है। कोरामंगला में फोरम मॉल, जो रियल इस्‍टेट डेवलपर्स और राजनेताओं की मिलीभगत को साफ दर्शाता है, जिसके निर्माण में शहरी योजनाओं और कानूनों की धज्जियां उड़ायी गईं। कुछ साल पहले इस गुनाह को कोर्ट में लाया गया, लेकिन अब किसी को नहीं पता कि उस केस का क्‍या हुआ।

खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश पर बहस तब तक पूरी तरह बेकार और पाखंड है, जबतक शहर के घनी आबादी वाले इलाकों में नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए मॉल्‍स बनाये जाते रहेंगे और जब तक बिना पार्किंग क्षमता और सड़क चौड़ी किये मॉल बनते रहेंगे।

इस प्रकार का शासन, जो विकास के पीछे चलता हो, वह माओवादियों के जंगल में तो विकास कर सकता है, लेकिन भारत में विस्‍फोटक आबादी वाले शहरों में नहीं। शहरी समुद्र की तीसरी दुनिया में अनियोजित भीड़ के बीच में खुदरा व्‍यापारियों की पहली दुनिया में किसे ज्‍यादा जरूरत है।

राजनीतिक तौर पर सशक्‍त और बिना टकराव वाले रास्‍ते से अंतर्राष्‍ट्रीय खुदारा भारत में आ सकते हैं। भारत में पहले से ही वॉलमार्ट है, जो वैश्विक भंडार के लिए थोक बाजार में पैठ जमा रहा है। वहां निजी निर्माणकर्ताओं और सिंगल ब्रांड रिटेलिंग का विकल्‍प होगा, जो अभी भी उपलब्‍ध है।

यद्यपि खुदरा बाजार में एफडीआई के खिलाफ और समर्थन में इस बहस से जो गायब है, वो है सुनियोजित मानचित्र। वह मानचित्र जिसमें मडीवाला में पारंपरिक, देशी सब्‍जी विक्रेता के सुधार की बात हो। उस सुधार की जिसमें वह विक्रेता सड़क के किनारे कूड़े के ढेर लगाने के बजाये बेहतर ढंग से सब्‍जी बेच सके। यह लेख ब्‍लॉग offstumped.in से लिया गया है।

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