देवानंद को मीडिया ने दी तवज्जो, काटजू को लगी मिर्ची

काटजू ने कहा कि मीडिया के पास सोचने-समझने की शक्ति खत्म हो गयी है। उसे समझ में नहीं आ रहा कि वो क्या कर रहा है क्या नहीं? देवानंद की मौत पर मीडिया का रवैया दर्शाता है कि पत्रकारों के पास प्राथमिकताएं तय करने की समझ नहीं रह गई है। उन्होंने कहा कि देश में कई आर्थिक और सामाजिक मुद्दे हैं जिन्हें मीडिया की उपेक्षा झेलनी पड़ती है।
काटजू ने कहा कि ऐसा नहीं है कि वो देव साहब के प्रशंसक नहीं है लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वो इस चीज से पीछे दीवानापन करें। पिछले पचास साल में ढाई लाख किसानों आत्महत्या कर चुके हैं लेकिन पी.साईंनाथ जैसे कुछ पत्रकारों के अपवाद को छोड़ दें तो पूरा मीडिया गंभीर बातों को पूरी तरह से भूल जाता है। इस बात से साबित होता है कि उसके पास सोच और निर्णय लेने के लिए परिपक्क दिमाग नहीं है।












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