उत्तर प्रदेश के मैदान-ए-जंग में राहुल गांधी

राहुल गांधी का जन्म 19 जून 1970 को हुआ था। राहुल उस नेहरू-गांधी परिवार से हैं, जो भारत का सबसे प्रमुख राजनीतिक परिवार है। राहुल की पढ़ाई विदेश में हुई। राहुल को 2009 के आम चुनावों में कांग्रेस को मिली बड़ी जीत का श्रेय दिया गया है। उनकी राजनैतिक रणनीतियों में जमीनी स्तर की सक्रियता को बल देना, ग्रामीण भारत के साथ गहरे संबंध स्थापित करना और कांग्रेस पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र को मजबूत करने की कोशिश करना, प्रमुख हैं। पिछले आम चुनाव के बाद अनुभवहीनता के चलते राहुल ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की सरकार में मंत्रीपद लेने से इनकार कर दिया था। आजकल राहुल अपना सारा ध्यान राजनीतिक अनुभव प्राप्त करने और पार्टी को जड़ से मजबूत बनाने पर केंद्रित कर रहे हैं।
राजनीतिक कैरियर
वर्ष 2003 में पूरे साल राहुल गांधी ने कांग्रेस के विभिन्न कार्यक्रमों में हिस्सा लिया लेकिन सक्रिय राजनीति से दूर रहे। विभिन्न कार्यक्रमों में जा-जा कर उन्होंने अनुभव हांसिल किये और फिर मार्च 2004 में चुनाव लड़ने की घोषणा की। उन्होंने अपना संसदीय क्षेत्र अमेठी चुना, जहां से उनके पिता स्वर्गीय राजीव गांधी और चाचा संजय गांधी भी सांसद रह चुके थे।
2007 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भी राहुल गांधी ने कांग्रेस को काफी तेजी से आगे बढ़ाने के प्रयास किये लेकिन विफल रहे। उन्हीं के नेतृत्व में पार्टी ने प्रदेश का चुनाव लड़ा और पार्टी ने 8.53% मतदान के साथ केवल 22 सीटें जीतीं. इस चुनाव में बहुजन समाज पार्टी भारी बहुमत के साथ सत्ता में आयी और मायावती मुख्यमंत्री बनीं। इसी के बाद राहुल गांधी को 24 सितंबर 2007 में पार्टी सचिवालय के एक फेरबदल में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति का महासचिव नियुक्त किया गया. साथ ही उन्हें युवा कांग्रेस और भारतीय राष्ट्रीय छात्र संघ की कमान भी सौंप दी गई।
2009 के लोकसभा चुनावों में राहुल गांधी ने कांग्रेस के अभियानों को पूरे देश में चलाया। अमेठी से वो जीते और उनकी पार्टी के नेतृत्व वाला संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन पूर्ण बहुमत से सत्ता में आया। उस दौरान राहुल ने 6 सप्ताह में देश भर में 125 रैलियां कीं। लेकिन राहुल का जादू बिहार विधानसभा चुनाव में नहीं चला। बिहार में उनकी तमाम कोशिशें नीतीश कुमार की सत्ता को हिला तक नहीं सकीं।
यूपी चुनाव और राहुल गांधी
अब देखना है कि राहुल गांधी यूपी में मायावती की सत्ता को हिला पायेंगे या नहीं। वर्तमान स्थिति की बात करें तो राहुल यहां भी युवा शक्ति और किसानों पर ज्यादा जोर दे रहे हैं। लेकिन उनकी सबसे बड़ी कमी यह है कि उनका रुटीन नहीं बदल रहा है। एक ही रुटीन- दलित की झोपड़ी में जाकर खाना खाना और हर मंच से एक ही बात मनरेगा-मनरेगा चिल्लाना उनके लिए घातक साबित हो सकता है।
कुछ हद तक राहुल गांधी भी भाजपा की तरह निगेटिव कैम्पेन कर रहे हैं। खैर यह उनकी मजबूरी भी है, क्योंकि केंद्र में भ्रष्टाचार की वजह से कांग्रेस पर लगे दाग कभी भी उभर कर सामने आ सकते हैं, इसलिए वो भ्रष्टाचार के बारे में ज्यादा कुछ बोलने से कतराते हैं। वो सिर्फ केंद्र की योजनाओं का बखान करने के अलावा कुछ कर भी नहीं सकते।
सच पूछिए तो राहुल गांधी को अगर यूपी में कांग्रेस को जीत दिलानी है तो हर शहर हर गांव में उन्हीं के हिसाब से मुद्दे उठाने होंगे, अन्यथा यहां भी उनका वही हाल होगा। अंत में अगर सकारात्मक पहलु देखें तो राहुल गांधी की कई बातें प्रदेश की सच्चाई बयान करती हैं। अगर वो अपने भाषणों में यूपी को 2020 तक विकसित राज्य बनाने का दावा कर रहे हैं, तो उनकी पार्टी को एक मौका दिया जा सकता है। लेकिन उससे पहले बेहतर होगा यदि प्रदेश के युवा उनके भाषणों की सीडी तैयार कर सुरक्षित रख लें। ताकि अगर उनकी सत्ता आये और 10 साल बाद यूपी में बदलाव नहीं हो, तो उसी सीडी को आधार बनाकर उन्हीं के खिलाफ आंदोलन कर सकें। और तो और अगर जरूरत पड़े तो कोर्ट में केस भी कर सकें।












Click it and Unblock the Notifications