पवार के पॉवर से क्यों भयभीत है कांग्रेस?

एक आम आदमी के रूप में सामने आये हरविंदर ने उन्हें 'चोर' जैसे शब्द से संबोधित किया। जिसके बाद शरद पवार के पक्ष में पूरी संसद एक हो गयी। क्या पक्ष और क्या विपक्ष हर कोई एक सिरे से पवार के साथ हुए बर्ताव की निंदा कर रहा है, जिसके बाद संसद के दोनों सदनों में निंदा प्रस्ताव पारित कर दिया गया।
आज संसद में मुद्दा महंगाई ना होकर बल्कि पवार पर पड़ा चांटा था। जिस पर सारे नेता एक हो गये। जबकि नेताओं को सोचना चाहिए था, कि आखिर पवार को थप्पड़ मारने की नौबत क्यों आयी? यह बातें सोचने पर मजबूर करती है कि कहीं ना कहीं सभी नेताओं को डर सता रहा है कि अगर पवार जैसा भारी-भरकम आदमी पिट सकता है तो उनकी बारी भी कभी ना कभी आ सकती है।
यहां शरद पवार को भारी-भरकम कहने का मतलब उनके शारीरिक वजन से नहीं है, बल्कि यह शब्द उनके राजनैतिक पॉवर के लिए प्रयोग किया गया है। कृषि मंत्रालय और 'क्रिकेट मंत्रालय' दोनों को संभालने वाले शरद पवार को कृषि में कम क्रिकेट में ज्यादा रूचि रहती है। तभी तो ना तो उनके पास दूध के दामों के उबाल का जवाब होता है और ना ही उन्हें सड़ते अनाजों की फिक्र। सब्जी, दाल, तेल अगर महंगे हो रहें तो भी उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि शायद उन्हें अभी भी 56 भोग वाली थाली परोसी जाती हो। आम आदमी अगर मंहगाई की आग में सुलग रहा है तो उनकी बला से।
सोचने वाली बात यह है कि आज कांग्रेस के सभी नेता पवार के थप्पड़ पर चिंता और शोक जता रहे हैं, लेकिन जब शरद पवार अपने मुंह से जहर उगलते हैं तो वो शांत क्यों रहते हैं आखिर शरद पवार के पास कौन सा तोता है, जिसमें कांग्रेस की जान कैद है। शरद पवार जब भी कोई आलोचनात्मक काम करते हैं तो कांग्रेस मौन व्रत धारण कर लेती है। और तो और यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी भी कुछ भी कहने में हिचकिचाती है। तो क्या यह मान लिया जाये कि कांग्रेस शरद पवार से डरती हैं।
ये शरद पवार ही थे जिन्होंने सोनिया को विदेशी कहा था, और तो और इस बात से नाराज होकर वो कांग्रेस से अलग हुए थे, अगर आज वो पंजे के साथ है तो क्या इसके पीछे कांग्रेस ने कोई समझौता किया है। पंजे को भी पता है कि पवार के बिना महाराष्ट्र में उसकी दाल नहीं गलने वाली है। शिवसेना औऱ मनसे से लड़ने के लिए उन्हें शरद पवार से हाथ मिलाया है। पवार के पॉवर का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आज महाराष्ट्र में एनसीपी ने बंद बुला लिया है।
क्या महज आठ सीटों के लिए एनसीपी नेता शरद पवार को मजबूरी में ढो रही कांग्रेस की बेबसी के चलते आम आदमी का कबाड़ा निकलता रहेगा। आखिर शरद पवार के हाथ में कृषि मंत्रालय क्यों हैं? जब उनके पास इस मंत्रालय से सबंधित कोई जवाब ही नहीं होता।
आखिर कब तक शरद पवार,उस साहूकार की तरह किसानों का खून पीते रहेंगे, जो किसानों से चंद अनाज के बदले चौगुना लगान वसूलता था। यह वो सवाल है, जो आम जनता के दिल और दिमाग में कौंध रहे हैं। क्योंकि आम जनता को तो यही लगता है कि शरद पवार के साथ जो भी हुआ सही हुआ।
या तो कांग्रेस निडर होकर पवार के वजन को कम करे या ऐसी और हरकतों के लिए पूरी तरह तैयार रहे क्योंकि दूध के दामों के उबाल से गुस्साये आम आदमी ने आज हाथ उठाया है, क्या पता कल हथियार उठा ले। इसलिए पवार के डर से कांग्रेस को मुक्त होना ही पड़ेगा वरना अप्रत्याशित परिणामों के लिए तैयार होना पड़ेगा, अब फैसला कांग्रेस के हाथ में है।
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