महंगा हुआ रोटी, कपड़ा और मकान, अब कहां जाये इंसान

दिन प्रति दिन ऊपर चढ़ते महंगाई के पारे में आम जनता जल रही है। बुरी तरह कराह रहा आमजन अब और किसी भी तरह के बोझ को ढोने के लायक नहीं बचा है। जले पर नमक छिड़कने से पहले चीनी की बात करें तो बेहतर होगा। शुरुआत करते हैं राजधानी दिल्ली से जहां तीन साल पहले चीनी का दाम 15 रूपये किलो था। तीन महिने पहले 22 रूपये और आज कीमत 30 रूपये प्रति किलो है। यानी पिछले 3 महीनें में 5 रूपये की और उससे पहले 3 साल में 7 रूपये की बढ़ोतरी हुई है।
यह तो रहा इतिहास, लेकिन वर्तमान की बात करें तो सरकार द्वारा जारी आंकड़ों कहते हैं कि इसी वर्ष शुरू हुई सीपीआई की नई श्रृंखला के आधार पर मुद्रा स्फीति का आकलन अगले साल से ही किया जा सकेगा। अखिल भारतीय स्तर पर खाद्य, पेय और तंबाकू वर्ग का खुदरा मूल्य सूचकांक अक्तूबर में 1.06 फीसद चढ़कर 114.4 के स्तर पर पहुंच गया जो इससे पिछले महीने 113.2 था। इसके परिणामस्वरूप सबसे ज्यादा बढ़ोतरी सब्जियों की कीमतों में हुई है। इसका सूचकांक महीने दर महीने के लिहाज से 2.98 फीसद चढ़ककर 120.8 के स्तर पर पहुंच गया। दूध और दूग्ध उत्पादों का उपभोक्ता मूल्य सूचकांक सितंबर की तुलना में 1.52 फीसद चढ़कर 120.4 हो गया।
इसके अलावा दालों का सूचकांक 1.70 प्रतिशत चढ़कर 101.8 अंक, कपड़ा, बिस्तर और जूते का सीपीआई 1.34 प्रतिशत चढ़कर 121, ईंधन और बिजली वर्ग का उपभोक्ता मूल्य सूचकांक अक्तूबर में 0.93 फीसद चढ़कर 119.2 पर पहुंच गया। आवास सूचकांक 108.8 से चढ़कर 110 पर पहुंच गया।शहरों में उत्पादों की कीमतों पर आधारित ये आंकड़े आम आदमी की समझ से परे हैं। अगर सीधी बात करें तो अगर महंगाई की आग में लोग ऐसे ही झुलसते रहे तो वर्ष 2020 में मिडिल क्लास के लिए जीवन असहनीय हो जाएगा।
महंगाई के चढ़ते आंकड़ों पर बात करें तो शुरूआत करते है 1940 से करना लाजमी होगा। उस समय 10 रूपये में लोग अपने परिवार का खर्च अच्छे रहन-सहन के साथ चला लेते थे। उसके बाद 20 साल आगे बढ़कर हम 1960 में लोग 100 रूपये में अपने परिवार का खर्च चलाकर बहुत कुछ बचा भी लेते थे। अगर 20 साल और आगे बढ़ें तो 1980 में 1000 रूपये में परिवार का खर्च चलाने के साथ-साथ भविष्य के लिए भी कुछ सुरक्षित कर लिया करते थे। वर्ष 2000 में 10,000 रुपए जिनका वेतन था, उनके परिवार का खर्च ठाठ से चल जाता था।
वर्ष 1940 से 2000 के बीच महंगाई के ग्राफ को देखें तो हर 20 साल में महंगाई 10 गुना बढ़ रही है। अगर यही ग्राफ आगे भी कायम रखते हैं तो जिस "2020 इंडिया" का सपना डा. एपीजे अब्दुल कलाम ने देखा है, उस इंडिया में एक मध्यमवर्गीय परिवार को घर चलाने के लिए एक लाख रुपए की आवश्यकता होगी।
तेजी से दाम बढ़ने के मामले में सब्जी और अनाज ने तो सोने चांदी को भी पीछे छोड़ दिया है। लोगों की थाली से आइटम गायब हो गए हैं औऱ दालों ने तो पिछले छह महीनों में जैसी छलांग लगाई है, उससे तो दाल रोटी खाकर गुजारा करने की बात भी अब अजीब लगने लगी है। और अगर ताजा महंगाई पर नजर ड़ाले तो पिछले तीन महीने में अनाज के भाव 30 से 35 फीसदी चढ़ चुके हैं।
अगर भारत की आर्थिक रूप रेखा आपके सामने लायें तो भारत में ब्याज दर बढ़ती जा रही है और विकास दर घटती जा रही है। सरकारी आकड़े को देखे तो पीछले 18 महिनें में 13 वीं बार आरबीआई ने ब्याज दरें बढ़ायी हैं, जबकि आरबीआई के अनुसार यह कदम महंगाई को रोकने के लिए उठाया गया है।
वर्ष 1940 से महंगाई हर 20 साल में 10 गुना बढ़ी, लेकिन यह तब का आकड़ा है, जब महंगाई पर सरकार का नियंत्रण हुआ करता था। आज सरकार के हाथ में मानो कुछ नहीं रह गया है। पेट्रोल के दाम तेल कंपनियों के हाथ में हैं, अनाज व खाद्य वस्तुओं के दाम कमोडिटी बाजार में शेयर मार्केट की तरह ऊपर नीचे होते हैं और सोने के दाम अंतर्राष्ट्रीय बाजार पर पूरी तरह निर्भर हो चुके हैं।
महंगाई के असर की बात करें तो इससे न तो गरीबी रेखा के नीचे वाले लोग प्रभावित हुए हैं और ना ही हाई क्लास सोसाइटी। गरीबी रेखा के नीचे वालों को सस्ते मूल्य पर राशन मिल जाता है, जबकि उच्च वर्ग लाखों-करोड़ों में खेल रहा है, उसे इन सबसे कोई मतलब नहीं। बीच में पिसे मध्यम वर्गीय लोग, जिनके बच्चों को सही पोषण नहीं मिल पाने का कारण भी यह महंगाई ही है। अब मध्यमवर्गीय मां-बाप 170 रुपए प्रति किलो सेब और 150 रुपए प्रति किलो अनार अपने बच्चों को नहीं दे पा रहे हैं। किसी तरह तन काट कर ले भी आये, तो खुद नहीं खाते। तरह-तरह के विटामिन व मिनरल्स से युक्त चीजों की तो दूर की बात है। सच्चाई तो यही है अगर महंगाई इसी तरह बढ़ती रही तो आने वाली पीढ़ी कुपोषित या कमजोर हो सकती है।












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