ऑनर किलिंग: जब जिंदगी जी चुके हत्यारे, तब मिली फांसी

जी हां हम बात कर रहे हैं मथुरा के 20 साल पुराने मामले की जहां प्यार करने के जुर्म में एक युवती, उसके प्रेमी व प्रेमी के दोस्त को पेड़ से उलटा लटका कर पीट-पीट कर उनकी हत्या कर दी। इस वारदात को एक-दो नहीं बल्कि 50 से ज्यादा लोगों ने अंजाम दिया। वर्ष 1991 में शहर के बरसाना में मोहब्बत करने वालों को ऐसी दर्दनाक मौत दी गयी थी जिसे सोच कर आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं। रोशनी-विजेंद्र ने घर से भागकर शादी कर ली, जिसमें उनके दोस्त किशन ने मदद की। चार दिन बाद यह लोग ये लोग जब वापस आये तो घरवाले ही नहीं गांव वाले भी इनके खिलाफ खड़े हो गये। महापंचायत बुलाकर प्रेमी युगल के साथ उनसे दोस्त को भी मारा-पीटा गया और जब इससे भी जी नहीं भरा तो पंचायत ने सरेआम तीन को फांसी देने का हुक्म सुनाया। पंचायत के निर्णय के बाद ग्रामीणों ने एक युवती और दोनों युवकों को पेड़ पर उल्टा लटकाकर बुरी तरह पीट-पीटकर मार डाला और फिर फांसी देने के बाद उनके शव भी जला दिये।
सरेआम हुई तीनों हत्याओं का मामला पुलिस तक पहुंचा पर हुआ कुछ नहीं। मामला अदालत में पहुंचा। अदालत को फैसला सुनाने में बीस साल लगे गये। पुलिस ने 53 लोगों के खिलाफ अदालत में आरोप पत्र दाखिल किया था। लम्बे समय तक चली कानूनी कार्रवाई के दौरान दोषी 13 अभियुक्तों की मौत हो गयी। बुधवार को बीस साल अपर जिला सत्र न्यायाधीश एके उपाध्याय ने आठ आरोपियों को फांसी और 27 को आजीवन कारावास की सजा सुनायी।
सभी अभियुक्त 60 साल से अधिक उम्र के हैं। न्यायालय ने तेज सिंह, बच्चू, तुलसीराम, कमल सिंह, राम सिंह, रमन सिंह, करन सिंह और सिर्रो को फांसी की सजा सुनायी है जबकि आजीवन कारावास की सजा पाने वालों में 95 वर्षीय नवल सिंह भी शामिल हैं। आजीवन कारावास पाने वाले अन्य लोगों में धन्नी, धर्मवीर, शिवचरन. सिंहराम, महेन्द्र, बल्ली, धर्म सिंह पुत्र कल्लू, जीवन, गिर्राज पुत्र गोविन्दा, मन्नी, सिरतो, गोपी, गिर्राज पुत्र कमल, काशी, चतुर सिंह हरचन्द, मंगतूराम, सुन्दरलाल, धर्म सिंह पुत्र हरचन्दी, बाटो पुत्र भग्गो, प्रीतम, श्रीचन्द, दीपी उर्फ दीपचन्द, गंगाराम, हरी और लाल सिंह शामिल हैं। एक आरोपी इस मामले में आज भी फरार है, जबकि तीन अभियुक्तों पर बाल न्यायालय में मुकदमा चल रहा है।
जरा सोचिये भ्रष्टाचार के लिए हम सीधे तौर पर अपने राजनीतिक एवं प्रशासनिक तंत्र के खिलाफ मोर्चा खोल देते हैं। लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाने वाला मीडिया जब अपनी जिम्मेदारियों से अडिग होता है, तो उसकी लगाम कस दी जाती है, लोकतंत्र के तीसरे स्तंभ लेकिन न्यायपालिका का क्या। क्या यह स्तंभ अभी भी एक-एक मामले को निपटाने में बीस-बीस साल लगायेगा। यदि हां, तो ऑनर किलिंग ही नहीं बल्कि हत्या, बलात्कार व अन्य सभी अपराधों के लाखों पीड़ितों को कभी न्याय नहीं मिलेगा।












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