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लखनऊ जेल के खतरनाक कैदी थे पंडित नहेरू

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    Jawahar Lal Nehru
    लखनऊ (सौरव मौर्या)। पंडित जवाहर लाल नहेरू, जो स्वतंत्र देश के पहले प्रधानमंत्री थे, लखनऊ जेल में उनका नाम एक खतरनाक कैदी के रूप में दर्ज रहा है। आजादी के आन्दोलन के दौरान राजद्रोह भड़काने के आरोप में लखनऊ जेल में लाये गये जवाहर लाल नेहरू को ब्रिटिश प्रशासन ने काफी खतरनाक माना था और सिपाहियों को उन पर खास नजर रखने की हिदायत दी थी।

    राजद्रोह भड़काने के आरोप में पंडित नेहरू को 19 मई 1922 को गिरफ्तार कर लखनऊ जेल में बंद किया गया था। जिस दिनों उन्हें जेल लाया गया था, भारत में अंग्रेजी हुकूमत का दमनकारी शासन था। लखनऊ जिला कारागार रात के सन्नाटे में इन्कलाब जिन्दाबाद और भारत माता की जय की गगनभेदी नारों से गूंज उठा था। यह नारा बड़े नेताओं के भी दिल दहलाने वाला था। उनके आने से समूचा कारागार परिसर जैसे अचकचा गया। कैदियों में खुसर फुसर होने लगी कि लगता है कोई बडा नेता आया है। जेल का फाटक खुला।

    नये लाये गये कैदी अन्दर पहुंचे। अंग्रेज सिपाही ने लिखा-पढ़ी शुरू की। नाम- पंडित जवाहर लाल नेहरू, पिता का नाम-पंडित मोती लाल नेहरू। 117, 506, 385, 116 सहित कई धाराएं लगी। जिस समय पंडित नेहरू को राजद्रोह भड़काने के आरोप में गिरफ्तार करके लखनऊ जेल में बन्द किया गया था, उस समय उनकी उम्र लगभग 34 वर्ष थी। पंडित नेहरू के साथ केशवदेव मालवीय सहित और भी अनेक आजादी के दीवाने थे। लखनऊ जेल में उस वक्त बाबू पुरषोत्तम दास टंडन, शांति स्वरूप और उमाशंकर दीक्षित समेत अन्य क्रान्तिकारी पहले से ही बन्द थे।

    पंडित नहेरू के आने की खबर मिलते ही सारे क्रान्तिकारियों में एक नया जोश भर गया। अभी कुछ ही समय पूर्व 87 दिन की जेल की सजा काटकर 3 मार्च 1922 को पंडित नहेरू सहित अनेक कांग्रेसी कार्यकर्ता रिहा हुए थे। अबकी बार पंडित नहेरू को 18 माह की कैद और सौ रूपये जुर्माने की सजा हुई थी। इन्हें इलाहाबाद में गिरफ्तार कर लखनऊ लाया गया था। पंडित नहेरू की इससे पूर्व वाली गिरफ्तारी के समय लखनऊ जेल की हालत क्रान्तिकारियों के लिए एक मायने में काफी अच्छी थी।

    नेहरू को तोड़ने के लिए आजमाये कई हथकंडे

    तब पंडित मोतीलाल नहेरू और पंडित जवाहर लाल नहेरू बाप-बेटे दोनों की एक साथ यहां रहे थे। तब जेल के कायदे-कानून में काफी ढील थी। तब राजनीतिक बंदियों को अखबार पढऩे की भी आजादी थी। जमादार और पहरेदार भी अन्दर का संदेश बाहर चुपचाप पहुंचा देते थे। लेकिन, इस बार तो पंडित जवाहर लाल नहेरू के आते ही बड़ी सख्ती होने लगी। पंडित मोती लाल नहेरू को लखनऊ जेल से नैनी जेल भेज दिया गया था। सो अबकी बार जेल के नियम काफी सख्त थे। अखबार पढऩे पर पाबंदी लगा दी गयी थी। लोगों से मिलना-जुलना बंद कर दिया गया था और चिठ्ठियों को भी सेंसर किया जाने लगा। खाना बदतर था बल्कि दो कौड़ी का था।

    पंडित जवाहर लाल नहेरू को खतरनाक कैदी समझा जा रहा था। उनका मनोबल तोडऩे के लिए रोज नये-नये हथकंडे अपनाये जा रहे थे। कैदियों पर तरह-तरह के जुल्म ढाये जा रहे थे। आठ महीने बाद यानि 30 जनवरी 1923 को जिस दिन पंडित जवाहर लाल नहेरू लखनऊ जिला जेल से रिहा किये गये, उस दिन उनके साथ बाबू पुरूषोत्तम दास टंडन, शांति स्वरूप, केशवदेव मालवीय और उमाशंकर दीक्षित भी रिहा हुए।बाबू पुरूषोत्तम दास टंडन को 7 दिसम्बर 1921 को धारा 17, 2, 14, 8 के तहत गिरफ्तार किया गया था। लखनऊ जिला जेल में उनका कैदी नं0 3034 था। केशवदेव मालवीय और पंडित जी को एक ही दिन गिरफ्तार किया गया था।

    मालवीय को धारा 506 और 385 के तहत गिरफ्तार किया गया था। उमाशंकर दीक्षित को 19 दिसम्बर 1921 को धारा 17, 2, 14, 8 के तहत गिरफ्तार किया गया था और 30 जनवरी 1923 को रिहा किया गया था। पूरे देश के नौजवानों में देश की आजादी के लिए एक अद्भुत जुनून था। गिरफ्तार होना या रिहा होना उनके लिए कोई खास बात नहीं थी।

    देश प्रेमियों ने बाप का नाम लिखवाया 'महात्मा गांधी

    लखनऊ जिला कारागार में ऐसे देश प्रमियों के नाम दर्ज हैं जिन्होंने बंदी के रूप में नाम तो अपना लिखाया था और पिता के नाम की जगह महात्मा गांधी लिखवाया था। जेल में प्राप्त अभिलेखों को देखने पर पहले तो पिता का नाम महात्मा गांधी देखने से आश्चर्य हुआ, फिर पन्ने पलटने पर पता चला, एक नहीं अनेक नाम ऐसे मिले जिन्होंने पिता के स्थान पर महात्मा गांधी का नाम लिखा रखा था। लखनऊ जेल में कैदी नं0 4126 पंडित जवाहर लाल नहेरू की रिहाई 30 जनवरी 1923 को हुई थी। इसके बाद पंडित जवाहर लाल नहेरू को लखनऊ जिला जेल कभी नहीं लाया गया। लखनऊ में उनका यह अंतिम कैदी जीवन था।

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    English summary
    Here is the special story on the birth anniversary of Jawahar Lal Nehru. This is the incident when Nehru was imprisoned in Lucknow Jail.

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