डाक्टरों के लिए पहेली बने पूर्व केंद्रीय मंत्री दासमुंशी

ormer Union Minister Priya Ranjan Das Munshi
दिल्ली (ब्यूरो)। पूर्व केंद्रीय मंत्री प्रिय रंजन दास मुंशी को तीन साल पहले हार्ट अटैक हुआ था। सुखद बात यह है कि वह जीवित है, लेकिन दुखद बात यह है कि वह अभी भी कोमा में हैं। दुनिया की हर आधुनिक चिकित्सा के बावजूद उनकी स्थिति बेहतर नहीं हो रही है। बिगड़ भी नहीं रही है।

कुल मिलाकर तीन साल में भी पूर्व केंद्रीय मंत्री प्रिय रंजन दास मुंशी की गुत्थी को इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल के डॉक्टर नहीं सुलझा सके हैं। हालांकि, जापान की 43 वर्षीय एक महिला का रिकार्ड तोड़कर दासमुंशी ने मेडिकल साइंस के इतिहास में नाम दर्ज करवाया है जो ऐसी समस्या से ग्रसित होने के बाद मात्र 165 दिनों तक ही जिंदा रह सकी। डॉक्टरों ने दासमुंशी को ब्रेन डेड घोषित नहीं किया है, लेकिन 1095 दिनों में भी दासमुंशी की सेहत में कोई खास परिवर्तन न होने से वे डॉक्टरों के लिए पहेली बन गए हैं। इतने दिनों तक इलाज चलने के बावजूद दासमुंशी का सिर्फ श्वसन तंत्र ही काम कर रहा है।

8 जुलाई 2008 को अपने निर्वाचन क्षेत्र के दौरे पर गए प्रियरंजन दास मुंशी को दिल दौरा पड़ा था लेकिन उस समय उन्हें ज्यादा आघात नहीं पहुंचा था। 12 अक्तूबर 2008 की रात दिल्ली में कार्डिएक अरेस्ट होने के बाद दासमुंशी को एम्स में भर्ती किया गया था। उस समय उनके मस्तिष्क को खून नहीं पहुंच पा रहा था। दासमुंशी की सांसें बंद थीं और बाएं भाग का दिल बंद पड़ा था। इलाज के लिए उनके पारिवारिक मित्र डॉक्टर अमरीका से भी आए थे। पारिवारिक डॉक्टर की सलाह पर दासमुंशी को 20 अक्तूबर 2008 को अपोलो अस्पताल की छठी मंजिल स्थित कमरा नंबर 2065 बी में भर्ती किया गया। सेहत में सुधार न होने पर 18 अक्तूबर 2009 को उन्हें एम्स ले जाया गया जहां स्टेम सेल थेरेपी देकर वापस अपोलो अस्पताल में भर्ती कर दिया गया।

अपोलो के डॉक्टरों को विश्वास था कि दासमुंशी की सेहत में सुधार होगा, लेकिन उनकी हालत जस की तस बनी हुई है। वे लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर नहीं हैं। मस्तिष्क के कुछ हिस्सों में खून पहुंच रहा है। इलाज करने वाले डॉ. विनीत सुरी का कहना है कि हार्ट, किडनी और पैनक्रियाज सामान्य रूप से काम कर रहा है, लेकिन वे यह कहने से हिचक रहे हैं कि दासमुंशी का मस्तिष्क काम नहीं कर रहा है। दासमुंशी के शरीर का बाहरी अंग कोई हरकत नहीं कर रहा है। दूसरी तरफ वे यह भी कहते हैं कि ज्यादा समय होने से रिकवरी की संभावना कम होते जाती है।

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