'8000 करोड़ के घोटाले में यूपी के मुख्य सचिव भी शामिल'

लोकायुक्त की जांच का दायरा बड़ा होता जिसमें मुख्यमंत्री पद आता तो शायद मायावती को अब लोकायुक्त की नोटिस जारी हो चुकी होती। यह कहना है भाजपा के राष्ट्रीय सचिव किरीट सोमैया का। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार भाजपा में बसपा सरकार में हुए घोटालों की पोल खोली है उसमें बार जांच मुख्यमंत्री तक पहुंचती है लेकिन मुख्यमंत्री पद के लोकायुक्त के दायरे में न आने के कारण जांच थम सी जाती है।
सोमवार को नोएडा आवास घोटाले को उजागर करते हुए श्री सोमैया ने कहा कि नोएडा में 38,22,000 वर्ग मीटर जमीन कुछ निजी कम्पनियों को आवंटित की गयीं। आवंटन में नियमों का ताख पर रखा गया। कई कम्पनियों के निदेशक एक ही हैं तो कई कम्पनियों के पते समान हैं बावजूद इसके उन्हें जमीन दे दी गयी। जमीन देने में सर्किल रेट का ध्यान नहीं रखा गया।
सोमैया ने कहा कि नोएडा में 16000 करोड़ रुपये की जमीन दी गयी जबकि यदि सर्किल रेट से जमीन दी जाती तो सरकार को 24000 करोड़ रुपये मिलते जबकि यदि बाजार भाव से जमीन का आवंटन होता तो शायद रकम इससे भी अधिक होता। जमीन देने में बोली, व निलामी प्रकिया भी नहीं अपनायी गयी बस आंखे बंद जमीन चहेतों को दे दी गयीं। लोकायुक्त से की गयी शिकायत में उन्होंने नोएडा में ओएसडी पद पर तैनात यशपाल त्यागी का नाम प्रमुखता से लिया। श्री सोमैया ने बताया कि उन्होंने लोकायुक्त से की गयी शिकायत में यह कहा है कि आखिर क्या कारण हैं कि यशपाल त्यागी की सहमति के बगैर जमीन की खरीद फरोख्त नहीं होती।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि सिंह माया सरकार के एक कद्दावर मंत्री के भाई हैं और जमीन सौदे में उन्होंने पक्षपात किया। शिकायत में पूर्व सचिव इंडस्ट्री अतुल कुमार गुप्ता व अनूप कुमार मिश्रा, नोएडा अथॉरिटी के चेयरमैन मोहिन्दर सिंह तथा सीईओ रमा रमण तथा वीके शर्मा को भी घोटाले में शामिल बताया है।
ज्ञात हो कि मिश्रा इन दिनों यूपी के मुख्य सचिव हैं। सोमैया ने कहा कि बीते दस वर्षों में प्रदेश में उतनी जमीन नहीं बेची गयी जितनी जमीन माया सरकार ने दो वर्षों में बेच दी। उनका कहना है कि माया सरकार ने चहेते व्यापारियों को सरकार धन पर व्यापार करने की सहूलियत दे रखी हैं जिसके तहत जमीन के सौदे के बाद रकम अदा करने के लिए भी तीन वर्ष का समय दिया जो सरकारी नियमों के पूरी तरह से खिलाफ है।












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