रथयात्रा से पीएम की कुर्सी तक पहुंचेगें आडवाणी!

Lal Krishna Advani
बैंगलुरू । 17 सितंबर से लेकर 19 सिंतबर तक भाजपा के दिग्गज नेता और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सद्धभावना उपवास रखा और सबके ये जताने की कोशिश की, कि उनकी नजर में सब बराबर हैं। चाहे हिंदू हो या मुसलमान सब भारत मां के बच्चे हैं। जिसके बाद लोगों के बीच ये कहा जाने लगा कि मोदी ही पीएम पद के दावेदार है, भाजपा पार्टी में।

ये वो ही भाजपा है जो पिछले चुनावों में अपने नेता लाल कृष्ण आडवाणी को पीएम इन वेटिंग कहकर संबोधित करती थी। लेकिन पिछले चुनावों में उसका ये फंडा उसी के ऊपर भारी पड़ गया। आडवाणी को लोग पचा नहीं पाये और भाजपा से किनारा कर बैठे। इसलिए उसने इस बार अपनी पार्टी के सामने और लोगों से यह कहा कि कोई भी नेता उसकी पार्टी में पीएम पद का दावेदार नहीं होगा। अगर पार्टी को पीएम बनाने का मौका मिलता है यानी कि अगर भाजपा सत्ता में वापस आती है तो ये फैसला बाद में लिया जायेगा ।

सोचने वाली बात ये है कि गडकरी के शब्दों के पीछे भागवत यानी की संघ की आवाज थी क्योंकि सबको पता है कि भाजपा का रिमोट कंट्रोल संघ के ही हाथ में हैं। गडकरी को पार्टी अध्यक्ष बनाने के पीछे भी भागवत का ही दिमाग था। लेकन उसी संघ की पूजा करने वाले आडवाणी ने एक तरफ मोदी के कसीदे पढ़ कर जहां लोगों का ध्यान पीएम की कुर्सी की ओर खींचा, वहीं अपनी रथयात्रा का ऐलान करके अपने आपको हीरो बनाने की कोशिश की।

लेकिन शायद संघ इस बात को ताड़ गया , इसलिए उसने चेतावनी देते हुए तत्काल प्रभाव से आडवाणी को मिलने का संदेशा भेजा और नतीजा ये हुआ कि आडवाणी को अपनी रथयात्रा के बारे में संघ के सामने रूख साफ करना पड़ा और कहना पड़ा कि उनके लिए पीएम की कुर्सी कोई मायने नहीं रखती। खैर अपने को संघ का सेवक बताने वाले आडवाणी ने संघ की बात मान ली और उनकी यात्रा को आज्ञा मिल गयी, जो बहुत जल्द अस्तित्व में आने वाली है।

लेकिन सोचने वाली बात ये है कि आडवाणी जैसे वरिष्ठ नेता जिनकी पूरी जिंदगी राजनीति के गलियारों से होकर गुजरी है, वो आखिर मान कैसे गये। अपने दिल और आंखो में पीएम पद का सपना संजोये आडवाणी आखिर अपनी इस रथयात्रा से साबित क्या करना चाहते हैं ।

कही वो कोई ऐसी राजनैतिक सियासत तो नहीं बिछा रहे जिसके तहत वो ऐसा माहौल पैदा कर दें जिससे जनसमर्थन उनके साथ हो जाये और संघ और पार्टी दोनों को उनके सामने नतमस्तक होना पड़े। आडवाणी के मंसूबे बहुत साफ नहीं दिखायी दे रहे हैं। एक तरफ अपने आप को पाक-साफ साबित करने में जुटे आडवाणी पार्टी और संघ के सामने भी खुलकर नहीं आ रहे हैं।

राजनीति के पुरोधाओं की माने तो इस समय आडवाणी समय और हालात की राजनीति खेल रहे हैं और अपने लिए मुक्कमल वक्त की तलाश में जुटे हैं। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि संघ, रथयात्रा और पीएम पद के बीच में उलझ गयी है भाजपा। जिसको उलझाने वाले उसके अपने ही लोग हैं।

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