संघ के दबाव में पीएम पद से हटे आडवाणी

लालकृष्ण आडवाणी ने नागपुर में कहा, मैं बस यही कह सकता हूं कि मैं पहले आरएसएस का स्वयंसेवक बना, फिर जनसंघ का एक सदस्य और फिर भाजपा का सदस्य बना। मैं महसूस करता हूं कि मुझे इन संगठनों से, अपने साथियों से जो कुछ मिला है और देश ने मुझे जो कुछ दिया है वह प्रधानमंत्री के पद से बहुत ज्यादा है। आपको बता दें कि उन्होंने यह बात आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के साथ बैठक के बाद पत्रकारों से कही।
सियासी गलियारे में चर्चा है कि संघ भ्रष्टाचार के खिलाफ यात्रा शुरू करने की आडवाणी की योजना से खफा है। भ्रष्टाचार के खिलाफ उनकी प्रस्तावित रथयात्रा को अगले आम चुनाव में प्रधानमंत्री पद के लिए भाजपा की उम्मीदवारी की दावेदारी के तौर पर देखा जा रहा था। आडवाणी से जब पूछा गया कि इस यात्रा के पीछे क्या यह मंशा है तो उन्होंने कहा कि मुझे लगता है कि इनका आपस में कोई संबंध नहीं है। उन्होंने दावा किया कि वह अपनी यात्रा के लिए आशीर्वाद लेने के उद्देश्य से नागपुर आए हैं। आडवाणी ने कहा कि मैंने आरएसएस सरसंघचालक मोहन भागवत से भेंट की और उनका आशीर्वाद मांगा। उन्होंने मुझे पूरा समर्थन और आशीर्वाद दिया और यात्रा के लिए शुभकामनाएं दीं।
वहीं दिल्ली में लालकृष्ण आडवाणी की टिप्पणी को लेकर पार्टी में एक बार फिर से मंथन शुरू हो गया है। पार्टी के कई नेताओं का मानना है कि अगर वे खुद को दौड़ से बाहर रखते हैं तो फिर साफ शब्दों में ही इसका ऐलान कर देते। सूत्रों का कहना है कि भले ही औपचारिक तौर पर भाजपा में कोई इस बात को स्वीकार न करे, लेकिन यह माना जा रहा है कि आडवाणी की संघ के नेताओं से मुलाकात के दौरान भी इस बात पर चर्चा हुई और शायद संघ की ओर से आडवाणी को संकेत भी दे दिए गए हैं।












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