किस झूठ पर खड़ा है हमारा जीवन?

जब नई दिल्ली के एयरपोर्ट पर उतरा तो मेरे मन में खयाल आया कि आज मैट्रो से सवारी की जाय। मात्र 12 मिनट में एयरपोर्ट से चली मेट्रो ट्रेन नई दिल्ली मेट्रो स्टेशन पर खड़ी थी और बयां कर रही थी देश के विकास की गाथा। आजादी के 64 साल बाद दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई समेत कई राज्य की राजधानियां विकास के बयार में उसी रफ्तार से बढ़ती आती हैं।

हाथ में मोबाइल, घर से लेकर दफ्तर तक में कंयूटर पर फिसलती ऊंगलियां, पांचसितारा होटलों की तर्ज पर बने हॉस्पिटल, छात्र से ज्यादा निजी कालेजों की संख्‍या और दूधिया रौशनी से जगमग माल में शॉपिंग करते वक्त अहसास होता है कि वाकई देश के साथ-साथ हम भी विकसित हो गये हैं। परंतु जब इन्हीं विकसित शहरों से मात्र चंद किलोमीटर के क्षेत्र से रूबरू होने का मौका मिलता है तो हकीकत से वास्ता पड़ता है और नजर आता है आजाद भारत की बुलंद तस्वीर!

आज भी पूरे देश में पीने के पानी को लेकर हाहाकार है। पानी के लिए जनता का संघर्ष अभी भी जारी है। छोटे शहरों की बात तो छोड़ दीजिए राजधानी नई दिल्ली भी इससे अछूती नहीं है। आज भी लोग यहां सुबह चार बजे जग जाते पीने का पानी एकत्र करने के लिए। कमोवेश यही दिनचर्या है लखनऊ, भोपाल, देहरादून और पटना के लोगों की।

ऐसा नहीं कि सरकार ने इतने सालों में प्रयास नहीं किया। पीने के पानी के लिए जो प्रयास हुए हैं उसके दस्तावेजों को खंगालेंगे तो आंकड़ों के खेल में उलझ जायेंगे। बस ये समझ लें कि जिस र तार से सरकारी नलों में पानी आता उसी रफ्तार से सरकारी प्रयास भी हो रहे हैं। तभी इतने वर्षों बाद भी देश की जनता को साफ और समुचित पानी मुहैय्या नहीं हो पाया है।

सरकारी अधिकारी रोना रोते हैं कि बिजली की समस्या ने पानी की समस्या खड़ी कर दी है। लो कर लो बात... अब इसे विडंबना ही तो कहेंगे कि आजादी के इतने बरस बाद भी ऐसे कई गांव मिल जायेंगे जहां के लोगों ने बिजली देखी ही नहीं है। बिजली का हाल तो पानी से भी बुरा है। शहरों की सड़कों पर खड़े खंभे, उससे लटकती तारें घर में लगे मीटर, लालटेन की रौशनी में बैठकर पंखा झूला रही जनता को मुंह चिढ़ाते हैं और बयां करते हैं आजाद भारत की बुलंद तस्वीर!

पानी और बिजली की दशा को देखकर ऐसा लगता है कि दोनों ही विभागों का स्वास्थ्य ठीक नहीं है। इन विभागों के स्वास्थ्य की कौन कहे खुद स्वास्थ्य विभाग का ही ब्लडप्रेशर आज तक नार्मल नहीं हो पाया। देश की चरमरायी स्वास्थ्य व्यवस्था पर खुद सरकार भी मुहर लगाती है तभी तो यूपीए मुखिया से लेकर बड़े-बड़े राजनेता एवं अधिकारी अपने इलाज के लिए विदेश रवाना हो जाते हैं। सरकारी अस्पतालों में बढ़ती भीड़, छोटे पड़ते वार्ड, विशेषज्ञ डाक्टरों की कमी और बेबस मरीज की मौत पर आंसू बहाते परिजन दिखाते हैं आजादी के बाद देश के स्वस्थ और सेहतमंद तस्वीर यानि आजाद भारत की बुलंद तस्वीर!

आजादी के छह दशक बाद भी पानी, बिजली और स्वास्थ्य की इस दशा का पुख्‍ता कारण तो अभी तलाशा जा रहा है पर एक कारण से इंकार नहीं किया जा सकता है वो है अज्ञानता यानि अशिक्षा। देश की शिक्षा प्रणाली का अंदाजा इसी बात से लगा सकते हैं कि राष्ट्रीय समाचार पत्रों में विज्ञापन प्रकाशित होता है कि 'आठवीं व नवीं फेल छात्र निराश न हो, इंटर पास करें, और संपर्क करें ..! उत्तर प्रदेश में शिक्षा के हालात ऐसे हैं कि सरकारी स्कूल में शिक्षक हैं पर छात्र नहीं और निजी स्कूलों में मात्र चार कमरों में पांच सौ छात्र पढ़ाई कर रहे हैं। हाईस्कूल के लिए भरे जा रहे फार्मों की सं या आजाद भारत की बुलंद तस्वीर दिखा रही है।

देश के संसद और विधान भवन में कालेधन व भ्रष्टाचार पर बहस चलती है और आरोप-प्रत्यारोप लगाये जाते हैं। परंतु जनता की मूलभूत सुविधाएं, पानी, बिजली, स्वास्थ्य और शिक्षा को लेकर संसद से लेकर सड़क तक कोई भी जनप्रतिनिधि हक की लड़ाई लड़ता नजर नहीं आता है। पूरा देश आजादी का जश्न मना रहा है पर हकीकत यह है कि सुबह से सांझ तक, हजार तरह से आज भी गुलाम हैं हम। झंडे फहरा देते हैं, मन की कोई ऊंचाई उसके साथ नहीं फैलती। गीत गा लेते हैं, पर मन कोई गीत नहीं गाता। रंग-बिरंगे फूल लगा लेते हैं लेकिन भीतर कोई फूल नहीं खिलता। हमारा जीवन ही जैसे झूठ पर खड़ा है तभी तो हमें नजर आती है आजाद भारत की बुलंद तस्वीर!

लेखक परिचय- श्री राजेश आनंद मासिक पत्रिका एराउंड द इंडिया के संपादक हैं।

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