राजीव गांधी चैरिटेबल ट्रस्ट पर दायर जनहित याचिका खारिज

High Court rejects appeal favouring Rajiv Gandhi Charitable Trust
चण्डीगढ़। पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने राजीव गांधी चैरिटेबल ट्रस्ट के पक्ष में भूमि को पट्टा पर देने और भूमि उपयोग परिवर्तन के लिए दी गई अनुमति के विरूद्घ धर्मबीर तथा अन्य द्वारा उच्च न्यायालय में दायर की गई जनहित याचिका को रद्द कर दिया है। उच्च न्यायालय ने याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता अश्वनी तलवार को यह सिद्घ करने को कहा कि दायर की गई याचिका किसी प्रकार जनहित में है।

अदालत ने अधिवक्ता से यह भी पूछा की 2009 से पहले ग्राम पंचायत को इस भूमि के लिए कितनी राशि प्राप्त हुई थी। अदालत को बताया गया कि इससे पूर्व प्राप्त की जा रही पट्टा राशि बहुत ही नाममात्र थी। याचिकाकर्ता अदालत को इस बारे संतुष्टi नहीं कर सके कि पट्टiे को रद्द किया जाना इस प्रकार जनहित में है और उन्होंने अपनी याचिका वापिस ले ली है। वापिस लिये जाने पर उच्च न्यायालय ने याचिका को रद्द कर दिया है।

इससे पूर्व, विभिन्न भू-मालिकों द्वारा गुडग़ांव में रिहायशी सैक्टर-58 से 67 के लिए अधिग्रहण प्रक्रियाओं के विरूद्घ 72 सिविल रीट याचिकाएं दायर की गई थीं। राज्य सरकार द्वारा मैरिट आधार पर मामलों पर विचार करने एवं निर्णय लेने के लिए गठित उच्चाधिकार प्राप्त कमेटी के समक्ष अपना प्रतिवेदन करने के विकल्प के साथ याचिकाकर्ताओं ने ये याचिकाएं भी वापिस ले लीं। इन याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान राजीव गांधी चैरिटेबल ट्रस्ट और चर्चगेट मैडिकल सोसायटी को भूमि पट्टiे पर देने, भूमि जारी करने और भूमि उपयोग परिवर्तन की अनुमति देने से संबंधित मुद्दे को पहली बार उच्च न्यायालय में उठाया गया। न्यायालय ने इन मामलों में रिकॉर्ड पर विचार किया और कोई प्रतिकूल टिप्पणी नहीं की। इन सभी सिविल रीट याचिकाओं को वापिस लेने के रूप में रद्द कर दिया गया।

इन सिविल रीट याचिकाओं के रद्द होने के उपरान्त गांव उल्लावास के धर्मबीर तथा अन्यों ने एक नई सिविल रीट याचिका/जनहित याचिका दायर की, जिसमें राजीव गांधी चैरिटेबल ट्रस्ट और चर्च गेट मैडिकल सोसायटी को ग्राम पंचायत द्वारा भूमि पट्टा पर दिये जाने को चुनौती दी गई। इस पर 18 अगस्त, 2011 को सुनवाई हुई और याचिकाकर्ताओं को यह सिद्घ करने के निर्देश देने के साथ इसे 23 अगस्त, 2011 तक स्थगित कर दिया गया कि यदि पट्टiे को रद्द कर दिया जाता है, तो वह जनहित में कैसे होगा। याचिकाकर्ताओं ने समय मांगा और 23 अगस्त, 2011 को मामले की फिर से सुनवाई हुई। आज भी याचिकाकर्ता यह सिद्घ नहीं कर पाये और उन्होंने अपनी याचिका को वापिस लेने की इच्छा व्यक्त, जिसकी उच्च न्यायालय ने अनुमति दे दी।

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