क्यों रखते हैं 30 दिन का रोजा?

Why 30 days Roza in Ramzan?
इस्लामिक शरीअत के मुताबिक मुसलमान बंदों एक फर्ज रोज़ा (व्रत रखना) है। इस मुबारक बरकत महीने का आगाज हो चुका है। नमाजे एशा के वक्त तरावीह की नमाज़ अदा की जा रही है। जंगेबदर (बदर के युद्ध) से एक माह और कुछ दिन पूर्व रमजान के रोजों की फर्जियत का हुक्म नाजिल हुआ। तबसे पूरी दुनिया के मुसलमान 29 या 30 दिन के रोज़े रखते हैं। इसमें लोग सूर्य निकलने से पहले से सूर्य डूबने तक किसी भी तरह की चीज खाने-पीने से परहेज करते हैं। यह सिलसिला पूरे माह चलता रहता है।

कुछ असहाब का ख्याल है कि रमज़ान गुनाहों को जला देता है। हजरत सलमान फारसी रजि. से खायत है कि हुजूर साहब ने फरमाया ए लोगों एक अजीमुलमुरत्तब और बरकतों वाला वह महीना आ रहा है, जिसमें एक रात ऐसी है, जो हजार महीनों से अफजल है। इस महीने की रातों में इबादत को अफजल करार देते हुए रमज़ान के रोजे अल्लाह ने फर्ज किए हैं। जिस शख्स ने इस महीने में एक नेकी भी या फर्ज अदा किया, उसका अजरा (बदला) उस सख्त की तरह होगा, जिसने किसी दूसरे महीने में सत्तर फर्ज अदा किए। यह महीना सब्र का है और सब्र का सिला जन्नत हैं।

वह महीना नेकी पहुंचाने का है। इस महीने मोमिन की रोजी में इजाफा किया जाता है। जिस शख्स ने किसी रोजेदार को अफतार कराया, उसके गुनाह (पाप) बख्श दिए गए। उसकी गर्दन अतिशे दोजख (नर्क की आग) से आजाद की जाएगी और रोजेदार के रोजे का सवाब कम किए बगैर अफतार कराने वाले को भी रोजेदार के बराबर का सवाब मिलेगा। सहाबाकराम रजि. ने अर्ज किया हैं यह महीना ऐसा है, इसका पहला हिस्सा रहमत है, दरमियानी (मध्य) मगफिरत है और आखिरी हिस्सा दोजख से आजादी है। माह शैतान कैद कर दिए जाते हैं।

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