अब पीटी नहीं झुलायी जाएगी गुडिय़ा

अगस्त माह में रक्षाबंधन से पूर्व मनाए जाने वाले नागपंचमी पर्व पर ऐसी मान्यता है कि एक राजा की लड़की जिसे प्यार से गुडिय़ा नाम से पुकारते थे। वह दूसरे राज्य के राजा के बेटे से प्रेम करने लगती है। दुश्मन राज्य के युवराज से प्रेम की बात गुडिय़ा के भाइयों को स्वीकार नहीं होती जिसके चलते वह गुडिय़ा की बीच चौराहे पर पिटाई कर देते हैं। उसे चौराहे पर इतना पीटा जाता है कि उसकी मौत हो जाती है।
गुडिय़ा की मौत के बाद उसके सातों भाई समाज में यह घोषणा करते हैं कि ऐसा अनैतिक कार्य कोई करेगा तो उसका हश्र भी ऐसा ही होगा। उस दिन के बाद से प्रतिवर्ष यह परम्परा चलती रही और चौराहों पर कपड़े की गुडिय़ा बनाकर पीटी जाने लगी। यह परम्मपरा आज तक चली आ रही है। वर्षों से चली आ रही इस कुरीति को समाप्त करने की पहल करते हुए महिला संगठनों ने यह मांग उठानी शुरू कर दी है कि गुडिय़ा को पीटने की परम्परा पर रोक लगनी चाहिए।
महिला संगठनों का कहना है कि इसके लिए लोगों को जागरूक करना होगा। नागपंचमी पर गुडिय़ा पीटने की परंपरा महिला उत्पीडऩ का प्रतीक है। महिला उत्पीडऩ की बढ़ रही घटनाओं को देखते हुए अब नई पीढ़ी को गुडिया पीटने की बजाय उसे झुलाने की परम्परा शुरू की जाएगी। वहीं परम्परा को मानने वाले लोग इसके विरोध में हैं। उनका कहना है कि गुडिय़ों को पीटने की परम्परा सदियों पुरानी है इसे तोडऩे का अधिकार किसी को नहीं है।











Click it and Unblock the Notifications