यूपी में दवा, एम्बुलेंस और अब बिस्तर खरीद घोटाला
लखनऊ। राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन बजट सालाना 3000 करोड़ से भी अधिक है। इतनी भारी भरकम रकम में कदम-कदम पर भ्रष्टाचार। सीएजी की की ऑडिट रिपोर्ट में जहां दवा व एम्बुलेंस खरीद में घोटाला सामने आया तो जब जांच आगे बढ़ी तो प्रदेश में बिस्तर खरीद घोटाले की भी परते उतरने लगीं। घोटाले में यूपी में 23000 बिस्तरों की खरीद का मामले प्रकाश में आया।
इस खरीद में अधिकारियों व शासन में बैठे लोगों की मिलीभगत से 12.80 करोड़ की धनराशि का घालमेल किया गया। यह भुगतान किसके आदेश से तथा किस आधार पर किया गया इस बारे में किसी को कुछ नहीं पता।
हाल ही में केन्द्रीय ऑडिट टीम ने जब एनआरएचएम के बजट की फाइलें खंगाली तो पता चला कि सरकारी धन की प्रदेश में जमकर लूट हई। शासन से लेकर निचले स्तर तक सभी ने अपनी जेबे भरने में कोई कसर नहीं छोड़ी।
ऑडिट में पता चला कि पांच करोड़ की दवाएं की खरीद संदेह के घेरे में हैं। दवाएं कब खरीदी गयीं कब उनका वितरण हुआ और हुआ भी या फिर सिर्फ कागजों पर होता रहा इस बारे में कोई मुंह खोलने को तैयार नहीं।
रिपोर्ट में यह पहले ही उजागर हो गया है कि एनआरएचएम की 600 एम्बुलेंस कभी चिकित्सालय पहुंची ही नहीं जबकि इस बार फिर प्रदेश सरकार ने केन्द्र के सामने 1012 एम्बुलेंस खरीदने का प्रस्ताव रख दिया था हालांकि केन्द्र ने इस प्रस्ताव को ही खारिज कर दिया।
जांच का अगला चरण प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों, सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों तथा जिला चिकित्सालयों की ओर बढ़ी तो बिस्तर घोटाले की पोल खुल गयी। एनआरएचएम के शुरूआती दौर से लेकर अब तक के दस्तावेजों को देखने से पता चला कि वर्ष 2005 में जब एनआरएचएम की शुरूआत हुई तो प्रदेश के स्वास्थ्य महकमें में 5000 बिस्तर हुआ करते थे लेकिन एनआरएचएम का पैसा आना शुरू हुआ तो विभाग ने बिस्तरों को इफरात में खरीदना शुरू कर दिया।
वर्तमान समय में स्वास्थ्य विभाग की फाइलें बताती हैं कि प्रदेश में 32,000 बिस्तर हैं। जबकि हकीकत यह है कि अधिकांश बिस्तर सिर्फ कागजों पर ही दिखायी देते हैं। विभाग ने एक बिस्तर 4,000 रुपये में खरीदा जिसके चलते अधिकारियों ने करीब 12.80 करोड़ रुपये का घालमेल किया। बिस्तरों को इस तेजी से खरीदा और चिकित्सालयों में पहुंचा दिया गया किसी को कानोकान खबर ही नहीं हुई यहां तक की मरीजों को भी बिस्तर देखने को नहीं मिले।
बावजूद इसकी आपूर्ति करने वाली कम्पनी को भुगतान करने में किसी प्रकार का विलम्ब नहीं हुआ। अब अधिकारी यह नहीं बता पा रहे हैं कि यह भुगतान किसके कहने पर किया गया। वर्तमान समय में कुर्सी पर बैठे अधिकारियों का तर्क हैं कि उनसे पहले वाले अधिकारियों ने जो किया उसकी जानकारी उन्हें नहीं जबकि पूर्व के अधिकारियों से कोई पूछताछ हो ही नहीं रही। फिलहाज जनता के लिए खर्च होने वाले पैसे को भ्रष्टiचारियों ने अपनी जेब में अवश्य रख लिया है। पढ़ें- उत्तर प्रदेश की खबरें।












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