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मुंबई हमले: क्‍या भारत दिन प्रतिदिन कमजोर हो रहा है?

13 जुलाई 2011 को हमारे मोबाइल पर एसएमएस आने शुरू हुए कि मुंबई में तीन जगह बम धमाके हुए हैं- ओपेरा हाउस, दादर और जवेरी बाजार (हीरों का बाजार)। यह मुंबई पर चौथा बड़ा हमला था- पहला 12 मार्च 1993 को हुआ था, जिसके पीछे अंडरवर्ल्‍ड डॉन दाउद इब्राहिम का हाथ था; दूसरा 11 जुलाई 2006 को जब सीरियल ब्‍लास्‍ट; तीसरा 26 जुलाई 2008 को हुआ, जो तीन दिन तक चला। 2008 का हमला सबसे बड़ा हमला था, जिसमें 166 लोगों की जानें गईं। इस हमले की योजना पाकिस्‍तान के खुफिया विभाग आईएसआई ने बनाई थी। और अब 13 जुलाई को यह चौथा हमला। मुंबई ने वाकई में कई घातक हमले झेले हैं।

अभी तक हमें नहीं पता है कि इन धमाकों के पीछे किसका हाथ है। तो जब तक सरकार अधिकारिक रूप से इस बारे में तस्‍वीर साफ नहीं कर देती, हम इस बात को नहीं उठायेंगे। हालांकि इंडियन मुजाहिदीन की ओर इशारा जरूर जाता है, लेकिन विस्‍तृत जानकारी अभी नहीं मिली है। किसी भी आतंकी संगठन ने अभी तक इसकी जिम्‍मेदारी नहीं ली है। वैसे यह एक इत्‍तफाक है कि मात्र दो दिन पहले आईएसआई के प्रमुख जनरल पाशा अमेरिका से संबंध सुधारने के लिए वॉशिंगटन गये थे। वैसे भारत एक सभ्‍य देश है और उसे वॉशिंगटन और पाशा के बीच के मामले से खास मतलब नहीं।

महाराष्‍ट्र के मुख्‍यमंत्री पृथ्‍वीराज चव्‍हाण और गृहमंत्री पी चिदंबरम की बॉडी लैंगवेज वाकई में काबिल-ए-तारीफ थी। उन्‍होंने 26/11 के मुकाबले इस बार उन्‍होंने स्थितियों को ज्‍यादा बेहतर ढंग से संभाला है।

खबरों के मुताबिक पी चिदंबरम गृह मंत्रालय से निकलना चाहते थे, लेकिल कैबिनेट मंत्रीमंडल में फेरबदल के तुरंत बाद यह उनके लिए बड़ी चुनौती है। वे 26/11 के बाद से गृहमंत्रालय संभाल रहे हैं।

भारतीय मानते हैं कि गृहमंत्री के रूप में चिदंबरम सबसे सही विकल्‍प हैं। 26/11 हमले के बाद कहा गया था कि नेशनल सिक्‍योरिटी गार्ड (एनएसजी) के कमांडो 24 घंटे सातों दिन तत्‍पर रहेंगे और जरूरत पड़ने पर देश के किसी भी स्‍थान के लिए रवाना हो जायेंगे।

बुधवार को 6:45 बजे पहला धमाका हुआ और 9:30 बजे के करीब हमने टीवी पर खबर देखी, "एनएसजी के कमांडो दिल्‍ली और हैदराबाद से मुंबई के लिए रवाना होने वाली है।" क्‍या हम कछुए की चाल नहीं चल रहे हैं? हालांकि यह माना जा रहा है कि एनएसजी पहले ही वहां से रवाना हो चुकी थी, सरकार ने सिर्फ इसलिए इस बात का खुलासा नहीं किया, ताकि वे आतंकियों की नज़र में नहीं आ जायें। यदि ऐसा ही हुआ है तो हम इसे स्‍वीकार करते हैं। यदि नहीं तो हम भारतीयों के लिए यह चिंता का विषय है।

भारतीय नहीं, हमारे राजनेता कमजोर हैं

1. दिसंबर 2001 में पाकिस्‍तान ने सफलतापूर्वक हमारे लोकतंत्र के हृदय पर हमला बोला, उन्‍होंने भारीय संसद पर हमला कर जवान को मार गिराया। जवान के परिवार वालों की हममें से किसी ने परवाह नहीं की। यह एक कड़वा सच है। यदि कोई राजनेता मरता तो उसके तमाम पुतले देश भर में लगा दिये जाते।

इस हमले का मुख्‍य आरोपी अफजल गुरु दिल्‍ली की जेल में आराम कर रहा है। अब उसने जम्‍मू-कश्‍मीर की जेल में स्‍थानांतरण कराने के लिए अर्जी दी है। हमारा तंत्र ऐसी अर्जियों को स्‍वीकार क्‍यों कर लेता है? हमारा राजनीतिक तंत्र अफजल गुरु को फांसी से रोकता है, वोटबैंक की इस राजनीति को धन्‍यवाद। यह सभी राजनीतिक दलों के लिए है।

2. नवंबर 2008 पर आते हैं, पाकिस्‍तानी सेना और आईएसआई ने मिलकर दो फाइव स्‍टार होटल और एक रेलवे स्‍टेशन सीएसटी को निशाना बनाया। टीवी चैनलों ने मुठभेड़ का लाइव टेलीकास्‍ट कर सेना के प्रयासों को बर्बाद कर दिया। मुंबई के असिस्‍टेंट सब इंस्‍पेक्‍टर तुकाराम ने एक मात्र आतंकवादी- कसाब को धर दबोचा। तुकाराम की मौत हो गई और आज लोग भी उसे भूल चुके हैं।

3. कुछ ही हफ्ते पहले हमारे समुद्री जहाजवाहक समुद्री डाकुओं के चंगुल से छूटे, पाकिस्‍तान के मानवाधिकार कार्यकर्ता अंसार बर्ने का। यद्यपि इस घटना में भारत सरकार ने काफी कुछ किया था, लेकिन ना तो लोग जानते हैं और ना ही जहाज पर सवार लोग। सोमाली डाकुओं की तो खुद की नेवी भी नहीं है। यदि हम समुद्री डाकुओं का मुकाबला नहीं कर सकते, तो आतंकवादियों का कैसे करेंगे?

4. 10 जुलाई 2011, भारत में दो बड़े रेल हादसे हुए। रेल राज्‍य मंत्री मुकुल रॉय ने मौके पर जाने से मना कर दिया। उन्‍होंने खुल कर कहा कि प्रधानमंत्री जायें। 12 जुलाई को कैबिनेट में फेरबदल के बाद नये रेलमंत्री दिनेश त्रिवेदी आये और उन्‍होंने कहा कि वे असम में मौके का जायजा लेने गये थे, वो भी इसलिए क्‍योंकि उनकी बॉस ममता बनर्जी ने उनसे कहा था। क्‍या कैबिनेट में किसी को डर और सम्‍मान है, हां हम प्रधानमंत्री से डर की बात कर रहे हैं? जवाब है नहीं।

सभी देशों की सरकारों ने हस हमले पर संवेदना व्‍यक्‍त की। सभी हमसे शांति बनाये रखने के लिए कह रहे हैं। हमें वास्‍तविकता समझने की जरूरत है, सिर्फ हम समस्‍या का हल निकाल सकते हैं। तब ऐसी घटनाओं के बाद पूरा विश्‍व तब हमें फूल भेजेगा।

वैसे भारत को निशाना बनाने का मुख्‍य कारण इसकी तेजी से बढ़ती अर्थ व्‍यवस्‍था है। हम पाषाण काल में वापस नहीं जाना चाहते, हम सिर्फ आगे3 बढ़ेंगे चाहे सरकार बढ़े चाहे नहीं। देखें- धमाकों पर विशेष कवरेज।

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