साझा सरकार की बलि चढ़ता रेलवे!

हावड़ा से दिल्ली जा रही कालका एक्सप्रेस में हुए हादसे के बाद किसी की तरफ से कोई बयान नहीं आया। आता भी कैसे क्योंकि रेलवे का कोई अगुआ ही नहीं है इस समय। हालात यह थे कि हादसे के 2 दिन बाद तक यह नहीं पता चला कि इसमे कितने लोगों की जान गई है और कितने लोग घायल हुए हैं। सेना कह रही है कि मरने वालों की संख्या 100 से ज्यादा है जबकि प्रशासन 70 लोगों के मारे जाने का दावा कर रहा है।
रेलवे का यह हाल आज से ही नहीं है। दरअसल रेलवे का यह हाल गठबंधन में बनने वाली सरकारों ने किया है। इस विभाग के साथ हमेशा ही सौतेला व्यवहार किया जाता है। कभी भी गठबंधन की मजबूत पार्टी ने इसे अपने हाथ में नहीं रखा है। इसे हमेशा उन पार्टियों के हाथों में सौंप दिया जाता है जो सरकार बनाने के लिए जरूरी सीटों का जुगाड़ करती हैं।
हमारे देश में जब से गठबंधन की सरकारों ने जोर पकड़ा है तब से रेलवे की हालत बद से बदतर होती गई। 1996 में जब एनडीए ने कांग्रेस को पटखनी देते हुए केंद्र की सत्ता हासिल की थी तो प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेई ने रेलवे की बागडोर अपने हाथ में ली थी। तब लगा था कि अब रेलवे की तकदीर बदल जाएगी।
अटल बिहारी की सत्ता ज्यादा दिन टिक न सकी और 13 दिन बाद ही उनसे प्रधानमंत्री की कुर्सी भी गई और रेलवे फिर बेसहारा हो गया। इसके बाद जनता दल ने गठबंधन में अपनी सरकार बनाई। इसमें रामबिलास पासवान को रेलवे की बागडोर सौंपी गई। इसके बाद जब एनडीए ने जब 1998 में केंद्र में वापसी की तो उनसे भी रेलवे छिन गया।
इसके बाद से रेलवे के साथ असली सौतेलापन शुरू हुआ। मंत्रिमंडल के गठबंधन के समय ऐसी बंदर बांट मचती थी कि जिसको जिस विभाग में फायदा नजर आता था वह उस विभाग पर अपना हाथ्ा रख देता था। रेलवे को कभी लीडिंग पार्टी का साथ ही नसीब नहीं हुआ।
1998 में एनडीए की वापसी के समय भारतीय जनता पार्टी सबसे बड़ी पार्टी थी। इस बार रेलवे चला गया गठबंधन में शामिल पार्टी जनता दल यूनाइटेड के पास। नीतिश कुमार ने रेलवे की बागडोर संभाली। 1 साल बाद ही गठबंधन में शामिल दीदी यानिकि ममता बनर्जी की नजर रेलवे पर पड़ गई। गठबंधन की मजबूरियों की वजह से एनडीए ने रेलवे विभाग तृणमूल कांग्रेस को दे दिया और ममता बनर्जी बन गईं रेलवे की अगुआ। वे 1999-2000 तक रेलवे मंत्री रहीं।
एकबार फिर मंत्रिमंडल में फेरबदल हुआ और फिर से रेलवे की बागडोर नीतीश कुमार के पास फिर से रेलवे विभाग चला गया। इस बार वे 2001 से लेकर 2004 तक रेल मंत्री रहे। इस दौरान उन पर रेलवे को बदहाली की तरफ ले जाने का आरोप लगता रहा। इसके साथ यह भी बातें सामने आई थीं कि उन्होंने रेलवे को घाटे वाला विभाग बना दिया है।
2004 में हुए लोकसभा चुनावों में एक बार फिर कांग्रेस ने वापसी की। सरकार बनाने के लिए कांग्रेस को कई पार्टियों से हाथ मिलाना पड़ा। सरकार बनी और एक गठबंधन भी बन गया जो कहलाया यूपीए। अब रेलवे विभाग को लेकर फिर से माथापच्ची हुई। इस बार रेलवे विभाग बिहार के पास यानिकि लालू प्रसाद यादव के पास चला गया।
घाटे में चल रहे रेलवे को लालू प्रसाद यादव ने मुनाफा कमाने वाला विभाग बना दिया। लेकिन इस मुनाफे ने ट्रेनों का हाल बुरा कर दिया। इसके बावजूद लालू की इस दौरान खासी तारीफ हुई। इसके बाद यूपीए 2009 में दोबारा चुनकर लोकसभा पहुंची। पिछले शासनकाल में रेलवे की बागडोर संभालने वाले लालू प्रसाद यादव इस बार गठबंधन में शामिल नहीं थे। ऐसे में उम्मीद की जा रही थी कि कांग्रेस रेलवे विभाग अपने पास ही रखेगा।
तृणमूल कांग्रेस ने दबाव बनाकर रेलवे हथिया लिया और ममता बनर्जी एक बार फिर रेल मंत्री बन बैठी। इस शासनकाल में सबसे ज्यादा रेल डिरेल के मामले सामने आए। इसके बावजूद भी इस ओर ध्यान नहीं दिया गया। यहां तक कि नक्सिलियों ने रेल पर कब्जा भी कर लिया था। इसकी सुरक्षा में कोई चौकसी नहीं की गई।
जब रेलवे मंत्री ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री बन गई तो रेलवे लावारिस हो गया। दुनिया के सबसे बड़े रेलवे को चलाने वाला कोई भी नहीं था। अब जब कालका मेल हादसा हुआ है तो सरकार की नींद खुली है। लेकिन फिर से दबाव में आते हुए सरकार ने यह विभाग गठबंधन में शामिल तृणमूल के पास ही रहेगा। यानिकि रेलवे के साथ सौतेला व्यवहार आने वाले समय में भी जारी रहेगा।












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