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निगमानंद रामदेव क्यों न हुए?

मिशन गंगा के तहत गंगा से अवैध रेत खनन के विरोध में एक सौ सत्रह दिन से आमरण अनद्गान करने वाले हरिद्वार के मातृ सदन के साधु निगमानंद की मौत खामोशी के साथ हो गई और मीडिया ने इसकी चर्चा तक करना जरुरी नही समझा । नदियों से अवैध रेत खनन पूरे देश में अवैध रुप से किया जाता है और इस कारोबार में लगे माफिया के सामने लोकतंत्र के सर्वोच्च प्रतिष्ठान भी असहाय साबित हुए हैं । यह बडे अफसोस की बात है कि उत्तराखंड की सरकार ने निगामानंद के अनशन को कभी गंभीरता से नहीं लिया ।

निगामानंद की मौत के पहले बहुत थोडे से लोग होगे जिन्हें यह जानकारी हो कि कोई साधु गंगा को उसकी पवित्रता लौटाने के लिए अपने प्राणों को दांव पर लगा चुका है । निगामानंद पिछली 19 फरवरी से आमरण अनशन कर रहे थे और गत 30 अप्रेल को उनकी हालत बिगड जाने के कारण अस्पताल में भर्ती किया गया था । इसके बाद भी उत्तराखंड सरकार ने इसे गंभीरता से नहीं लिया और न उनके उपचार की उचित व्यवस्था की । रामदेव के अनशन की नौटंकी पर पलक पांवडे बिछाने वाली राज्य सरकार ने यह जरुरी नहीं समझा कि एक पवित्र उद्देद्गय के लिए अपने जीवन को दांव पर लगाने वाले के प्राणों की रक्षा की जाए ।

निगमानंद भी रामदेव की तरह नौटंकीबाज होते तो मीडिया से लेकर सरकार सब उनके चरणों में लोटपोट होती रहती । रामदेव के दो दिन के अनशन का रात दिन प्रसारण करने वाले टीवी चैनलों ने कभी एक मिनट भी निगामानंद को नहीं दिया । केंद्रीय पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश का कहना है कि उनके मंत्रालय ने पिछले साल ही गंगा से अवैध रेत खनन रोकने के लिए प्रदेद्गा सरकार को पत्र लिखा था लेकिन सरकार ने कोई कार्रवाई नहीं की । नदियों की रेत जल का संचय करती है और इससे भूजल स्तर पाताल में नहीं जा पाता ।

पर्यावरण संरक्षण के लिए भी यह जरुरी है कि नदियों में उचित मात्रा में रेत का जमाव बना रहे । लेकिन मुफ्त के करोडों के इस कारोबार में लगे माफिया ने नदियों का जीवन बिगाड़ कर रख दिया है जिससे न केवल जल की समस्या खडी हुई बल्कि पर्यावरण का संतुलन भी बिगड रहा है । एक तरफ गंगा को उसकी पवित्रता लौटाने के लिए सरकार अरबों रुपए मिशन गंगा पर खर्च कर रही है वहीं दूसरी तरफ सत्ता संवेदन हीन हैं कि एक पवित्र उद्देश्य के लिए ईमानदारी से किसी तरह की नौटंकी या नाटक किए बिना खामोशी से अपने जीवन को दांव पर लगा देने वाले की परवाह करना तक जरुरी नहीं समझती ।

हालांकि कि मातृ सदन की ओर से यह आरोप लगाया गया है कि रेत माफिया के दबाव में अस्पताल में निगमानंद को जहर दिया गया था जिससे वह कोमा में चले गए । यह मामला इससे और भी गंभीर हो जाता है । यह कैसा लोकतंत्र है जो माफियाओं और दबंगों के आगे दण्डवत रहता है और समाज को बचाने के लिए ईमानदारी से जो लोग कुछ करना चाहते हैं उन्हें जनता की चुनी हुई सरकार मरने के लिए छोड देती है । इस सारे मामले में प्रदेश सरकार अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकती । क्या देश का लोकतंत्र और सत्ता प्रतिष्ठान दलालों माफियाओं और नाटकखोरों लिए ही समर्पित हो चुका है ?

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