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हुसैन साहब : सूना हो गया कैनवास

Maqbool Fida Husain
आधुनिक युग के पिकासो मकबूल फिदा हुसैन अब इस दुनिया में नहीं रहे उनके बाद अब उनकी प्रसिद्धि और उनके साथ जुडे विवादों की स्मृतियां रह गई हैं । वे रंगों और विवादों के सम्राट थे । खुले विचारों और अपने कला कर्म के प्रति दृढ मकबूल साहब हमेशा भारत में कट्‌टरपंथियों के निशाने पर रहे । कई मायनों में वह पिकासो से भी बडे कलाकार थे । वह अपने इरादे के इतने पक्के थे कि उन्हें जो करना होता था उसे किसी की परवाह किए बिना पूरा करते थे ।

यह भी कहा जा सकता है कि वे कुछ असामान्य किस्म के इंसान थे और यही उनकी महानता भी थी जिसके कारण वह प्रसिद्धि के चरम तक पहुंचे । साठ के दशक में हुसैन डॉ. राम मनोहर लोहिया के सम्पर्क में आए । उस समय हुसैन नौजवान हुआ करते थे ।लोहिया के सम्पर्क में आने के बाद हुसैन की चित्रकला की दिशा ही बदल गई । लोहिया ने हुसैन पीठ भी थपथपाई पर साथ में यह भी की कहा कि तुम्हारी कला अभी टाटा बिरला की कोठियों की दीवारो की सजावट की चीज ही है, इससे बाहर निकलो और समाज को देखो जो तुम्हारे जैसे कलाकार का इंतजार कर रहा है ।


लोहिया द्वारा हुसैन पीठ थथपाने का असर यह हुआ कि हुसैन की कला की दुनिया ही बदल गई । लोहिया के कहने पर हुसैन हैदराबाद चले गए और वहां बदरी पित्ती के यहां रह कर उन्होंने पूरी रामायण को कैनवास पर उतार दिया । बाद में हुसैन के यह चित्र पित्ती की प्रसिद्ध साहित्यिक पत्रिका कल्पना में प्रकाशित हुए । उन दिनों कल्पना पत्रिका देश की सब से बडी साहित्यिक पत्रिका थी और इसके साथ देद्गा के सभी प्रसिद्ध साहित्यकार और कवि जुडे हुए थे ।


रंगों और कूची से रामायण को साकार करते-करते हुसैन के सोच की दुनिया बदल गई और उनकी कालजयी कला देश के सामान्य आदमी तक उतर आई । यह सिलसिला अनवरत चलता रहा । पैरों में जूते या चप्पल नहीं पहनना भी उनकी इसी सनक में था । जिंदगी के आठ दशक पूरे करने के बाद वह फिल्म अभिनेत्री माधुरी दीक्षित के सौन्दर्य पर मोहित हो गए और उनके कई चित्र कैनवास पर ही नहीं उकेरे बल्कि माधुरी पर उन्होंने गजगामिनी नामसे एक फिल्म का भी निमार्ण किया ।


भारत में वह कट्‌टरपंथियों के हमेशा निशाने पर रहे पर इसकी उन्होंने कभी परवाह नहीे की । हुसैन अब इस दुनिया में भले ही नहीं हों पर वह अपनी कालजयी कृतियों के रुप में हमेशा हमारे बीच मौजूद रहेंगे । अगर यह कहें कि हुसैन पिकासो से भी महान कलाकार थे तो गलत नहीं होगा। पिकासों को उनके देश ने अत्यधिक सम्मान दिया था पर भारत में हुसैन को लेकर कुछ लोग हमेद्शा हंगामा करते रहे, इसे दुर्भाग्य ही कहा जायेगा । जिस की चित्र कृतिया करोडो डालर में बिकती हो कया वह कोई सामान्य कलाकार हो सकता है इस पर देश में कुछ सिरफिरे लोगों ने विचार नहीं किया ।

लेकिन भारत सरकार की और से उन्हें सर्वोच्च सम्मान पदम विभूच्चण से नवाजा गया था । पार्थिव रुप से हुसैन के इस दुनिया में नहीं रहने के बाद भी उनकी यद्गाकीर्ति हमेशा उनकी स्मृति को अक्षुण्य बनाए रखेगी ।

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