क्यों सबसे अलग है बिहार की सुपर-30

जी हां कई बड़े फर्क हैं, जो सुपर-30 को अन्य संस्थानों से अलग करते हैं। सुबह अखबार या इंटरनेट पर खबरों में आपको यह तो पता चल ही गया होगा कि सुपर-30 में इस बार 30 में से 24 छात्र आईआईटी में चयनित हुए हैं। यानी यहां का परिणाम 80 प्रतिशत रहा। इस संस्थान में हर साल मात्र 30 छात्रों को चुनकर आईआईटी के लिए तैयार किया जाता है। ये छात्र बड़े-बड़े घरानों के नहीं बल्कि ऐसे गरीब घरों के होते हैं, जिनके घर दो वक्त की रोटी जुटाना भी मुश्किल होता है।
अब हम आते हैं उन संस्थानों में जहां हर साल 500 से लेकर 1000 छात्रों का प्रवेश होता है और संस्थान उन्हें आईआईटी की प्रवेश परीक्षा के लिए तैयार करते हैं। बारहवीं के परिणाम आते ही कोचिंग संस्थानों के बाहर लाइन लग जाती है। अभिभावक अपने बच्चों पर लाखों रुपए खर्च करने के लिए तैयार रहते हैं। इसी का फायदा उठाते हुए इन संस्थानों की फीस 20 हजार प्रति विषय से लेकर 50 हजार प्रति विषय तक होती है। यानी 60 हजार से लेकर डेढ़ लाख रुपए तक फीस। उसके बाद भी गारंटी नहीं कि बच्चा आईआईटी में सेलेक्ट हो ही जायेगा।
यही नहीं एक-एक कक्षा में 100 से 200 तक छात्र एक साथ पढ़ाई करते हैं। आखिरी बेंच तक आवाज़ साफ जाये, इसके लिए माइक व स्पीकर की व्यवस्था रहती है। बोर्ड की जगह प्रोजेक्टर लगाया जाता है, वगैरह-वगैरह। जरा सोचिये गुरुजी तो अपनी आवाज माइक के माध्यम से पहुंचा देते हैं, क्या बच्चे की आवाज़ उनतक पहुंच पाती है। नहीं कतई नहीं। यही करण है कि 60 फीसदी से ज्यादा बच्चे सवाल पूछते ही नहीं हैं। जाहिर है जिस पढ़ाई में छात्र सवाल नहीं पूछे वो किसी काम की नहीं। अंत में यही होता है उन 200 में से मात्र आठ या दस बच्चे ही आईआईटी में सेलेक्ट हो पाते हैं।
अब आप बतायें, इस तरह से धन उगाही कर रहे कोचिंग संस्थानों का क्या करना चाहिये? अपनी प्रतिक्रिया लिखने के लिए नीचे कमेंट बॉक्स में याहू/जीमेल/फेसबुक/ट्विटर आईडी से लॉगइन करें और जवाब लिखें।












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