ममता की आंधी में ढह गया लाल दुर्ग

बीबीसी संवाददाता, कोलकाता से
ममता बनर्जी के कालीघाट स्थित घर के बाहर समर्थकों का जमावड़ा. रोमन सम्राट जुलियस सीज़र के ज़माने में एक कहावत उपजी थी, "ऑल रोड्स लीड तो रोम" यानि हर सड़क रोम की ओर जाती है. आज कलकत्ता में कह सकते हैं 'ऑल रोड्स लीड तो कालीघाट' यानी हर सड़क ममता बनर्जी के घर की ओर जाती है.
महज़ तैंतीस साल की उम्र में मंत्री बने दस साल तक प्रदेश के मुख्य मंत्री रहे बुद्धदेब भट्टाचार्य ने अपना इस्तीफ़ा राज्य के राज्यपाल एम के नारायण को सौंप दिया है. कोलकाता की जाधवपुर सीट से बुद्धदेब भट्टाचार्य खुद भी चुनाव हार गए हैं. उनको थोड़े सालों पहले तक उनके विश्वासपात्र रहे राज्य के पूर्व मुख्य सचिव मनीष गुप्ता ने हराया है.
राज्य में वाम मोर्चे के समन्वयक और सीपीआई(एम) की राज्य इकाई के सचिव बिमान बोस ने बुद्धदेब भट्टाचार्य के साथ जारी एक बयान में इस हार को 'अप्रत्याशित' बताया है. उन्होंने कहा है कि वामपंथी राज्य में एक सकारात्मक विपक्ष की भूमिका निभायेगें और हार के कारणों की समीक्षा करते हुए गलतियों को सुधारेगें.
तृणमूल कांग्रेस समर्थकों ने जीत जश्न हरे गुलाल के साथ मनाया. जैसे-जैसे चुनाव के रुझान आने लगे ममता बनर्जी के घर के बाहर हर तरह के लोगों भीड़ बढ़ती गई. शहर के एक दूसरे कोने में चौतीस साल इस राज्य की सत्ता शक्ति के सबसे बड़े केंद्र भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी मार्क्सवादी के कार्यालय के बाहर केवल पत्रकार और पुलिस वाले हैं.
नेता तो छोड़ दीजिये आम कार्यकर्ता तक सड़कों से नदारद हैं. महज़ चौबीस घंटे पहले तक लाल झंडों से पटी रहने वाली अलीमुद्दीन स्ट्रीट पर ग़लती से भी कोई लाल झंडा नहीं दिखता. पूरे देश में हर जगह जीतने वाले लाल रंग का गुलाल उड़ाते हैं लेकिन शुक्रवार को कोलकाता में ममता बनर्जी के घर के बाहर जमा कार्यकर्ता हरे रंग का गुलाल उड़ा कर अपनी खुशी जाहिर कर रहे थे.
चुनाव रुझानों से जब उनकी सरकार बनना तय हो गई तो ममता बनर्जी दोपहर में खुद एक हरे रंग के बोर्डर वाली सफ़ेद साड़ी में आईं और लोगों का धन्यवाद अदा लिया. ममता बनर्जी ने कहा, "ये लोगों की जीत है, लोकतंत्र की जीत है और माँ माटी मानुष की जीत है. मुझे लगता है ये स्वतंत्रता संग्राम की तरह था. मैं ये जीत लोगों को समर्पित करती हूँ." पश्चिम बंगाल की भावी मुख्यमंत्री ने कहा कि उन्हें प्रधानमंत्री सोनिया गांधी सहित कई अन्य बड़े नेताओं से बधाइयां मिल रही हैं.
वामपंथी मोर्चे के खेमें में छाई उदासी
जीत के स्पष्ट संकेत आते ही ममता बनर्जी के घर के बाहर मेला लग गया. उनके घर के बाहर कहीं कोई वैष्णव घूँघरू पहने हारमोनियम बजा के कृष्ण के भजन गा रहा था तो घर से कोई सौ मीटर दूर सिख समुदाय लगंर लगा कर शरबत और खाने की चीज़ें बाँट रहा था.लेकिन कोलकाता की सडकें अगर ममता की जीत के रंगों में सजी थीं तो इसके बाज़ार राज्य में नई सरकार के सामने चुनौतियों की कहानी बयान कर रहे थे.
राजनीतिक और दलीय हिंसा की आशंका के चलते शहर में ज़्यादातर दुकानदारों ने अपनी दुकाने बंद ही रखीं. जाधवपुर इलाके में एक चाय की दुकान के बाहर खड़े चार पांच सौफ्टवेयर इंजीनियरों से मैंने बात की तो सबने हिंसा की आशंका जताई. इसी तरह से बालीगंज की एक मस्जिद से नमाज़ पढ़ कर निकले युवाओं ने भी एक स्वर में कहा, "हिंसा होना तो तय लगता है. तृणमूल के लोग और सीपीएम के लोगों में भीड़ंत तो जल्द ही शुरू हो जाएगी."
फ़िलहाल ममता बनर्जी, वामपंथी मोर्चा और पश्चिम बंगाल अपनी-अपनी तरह से इतिहास की इस नई करवट को आँखें फाड़े देख रहे हैं.












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