बहुत कठिन है डगर पनघट की...

बहुत कठिन है डगर पनघट की...
अविनाश दत्त

बीबीसी संवाददाता, कोलकाता से

पश्चिम बंगाल की नई सरकार के सामने चुनाव जीतने के बाद कई बड़ी चुनौतियाँ सामने हैं. पश्चिम बंगाल की नई सरकार के सामने चुनाव जीतने के बाद कई बड़ी चुनौतियाँ सामने हैं. पटाखों नारों और नगाड़ों के शोर के बीच पश्चिम बंगाल की मत पेटियां 13 मई को चाहे जो कहें, इतिहास उसे कान लगा कर सुनेगा और पीढ़ियों तक सुनाएगा. गुरूवार को कलकत्ता में सारे लोग साँसे रोके नतीजे का इंतज़ार कर रहे हैं.

लेकिन इतिहास केवल यह बता कर चुप नहीं होगा कि त्रिणमूल कॉंग्रेस नेता ममता बनर्जी और वाम पंथी नेता बुद्धदेब भट्टाचार्य में से किसने 2011 की जंग जीती. इतिहास ये भी नज़र गड़ा कर देखेगा कि उसके बाद जो जीता उसने बंगाल को बदलने के लिए क्या किया.

वरिष्ठ राजनितिक विश्लेषक रजत राय बंगाल के सामने खड़ी चुनौतियों की बात करते हुए कहते हैं, "पहली समस्या क़ानून व्यवस्था की है. दूसरा है ज़मीन का प्रश्न और बहुत हद तक बंगाल की सारी समस्याएं इन दो समस्याओं से उपजती हैं."

कुछ विश्लेषक मानते हैं कि नंदीग्राम और सिंगुर की घटनाओं से बंगाल को क्षति पहुँची. बंगाल में आप किसी से भी बात कीजिए क़ानून व्यवस्था की समस्या को हर कोई सबसे ऊपर रखता है. ख़ास तौर पर राजनितिक हिंसा की बात पर राजनीतिज्ञ और आम लोग सभी एक राय के हैं.

एक अन्य वरिष्ठ राजनीतिज्ञ विश्लेषक सौम्य बंधोपाध्याय कहते हैं कि राज्य के कई इलाकों में सत्ताधारी सीपीएम और तृणमूल कांग्रेस के बीच हुई राजनितिक हिंसा ने विकास का पहिया पूरी तरह से रोक दिया है. वो समझाते हैं, "पहले मोहल्ले में एक ही दादा था तो कोई गतिरोध नहीं था. अब एक और आ गया तो ख़ून-ख़राबा, झमेला तो होगा ही. जैसे-जैसे दोनों दल बराबरी पर आ रहे हैं, लड़ाई हो रही है. पर अगले एक दो महीने में जो भी सरकार आती है उसकी सबसे बड़ी चुनौती यही होगी. अगर ये न रुका तो पश्चिम बंगाल का विकास फॉर पांच साल के लिए रुक जाएगा."

तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस दोनों राज्य की वित्तीय स्थिती भयावह होने की बात कहते आ रहे हैं. देश में पश्चिम बंगाल सरकार 2.7 लाख करोड़ के क़र्ज़ के तले दबी हुई है और उसके पास विकास के लिए कोई पैसा नहीं है.

लेकिन विश्लेषक रजत राय इसे कोई बड़ी समस्या नहीं मानते. राय का कहना है, "केंद्र सरकार का क़र्ज़ चालीस लाख करोड़ रुपए के ऊपर है. समस्या क़र्ज़ नहीं है. जब तक आपकी साख बाज़ार में न गिर रही हो. रिज़र्व बैंक सहित अन्य देनेवालों को लगता है की आप क़र्ज़ लौटा सकते हैं तब तक क़र्ज़ कोई परेशानी का सबब नहीं."

राय मानते हैं कि वित्तीय संकट से कल कारखानों के लिए बड़ा भूमि अधिग्रहण का प्रश्न है. वो कहते हैं कि नंदीग्राम और सिंगुर में भूमिअधिग्रहण के भीषण विरोध के बाद के बाद निजी निवेश की संभावनाएं बुरी तरह से प्रभावित हुई हैं.

कुल मिला कर ऐसा लगता है कि पश्चिम बंगाल के लोग अपनी समस्याओं से युद्ध के लिए मुख्यमंत्री नहीं सेनापति चुन रहे हैं. चाहे जो भी हो बहुत कठिन है डगर पनघट की........

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