वाईएसआर से ज्यादा कठिन है खांडू के हेलीकॉप्टर को ढूंढ़ना

खांडू के हेलीकॉप्टर को ढूंढ़ने में कितना समय लगेगा, कुछ कहा नहीं जा सकता, क्योंकि यहां की परिस्थितियां उससे कहीं ज्यादा विषम हैं। जी हां वाईएसआर की तुलना में खांडू को ढूंढ़ना अत्यंत कठिन है। यहां हम तुलना करेंगे उन जगहों की जहां हेलीकॉप्टरों ने एयरट्रैफिक कंट्रोल से संपर्क तोड़ा।
वाईएसआर के हेलीकॉप्टर ने करनूल में संपर्क तोड़ा था। वहां छोटी-छोटी पहाडि़यां हैं और उन पर घने जंगल। उन पहाडि़यों की ऊंचाई 3600 फीट है, यानी करीब 1100 मीटर वहीं तवांग की पहाडि़यां जहां खांडू के हेलीकॉप्टर से संपर्क टूटा उनकी ऊंचाई इसके दोगुनी से भी ज्यादा है- 8757 फीट यानी 2669 मीटर। यहां भी उतने ही घने जंगल हैं, जितने की नल्लामाला में। दोनों जगहों की ऊंचाई से आपको जगह-जगह पड़ने वाली खाईयों का भी अंदाज़ा हो गया होगा।
पहाड़ की ऊंचाई जितनी अधिक होती है, उनके बीच की खाई भी उतनी ही गहरी होती है। मौसम की बात करें तो जिस समय वाईएसआर का हेलीकॉप्टर दुर्घटनाग्रस्त हुआ था, उस समय नल्लामाला में मूसलाधार बारिश हो रही थी। उसी बारिश के बीच सेना के जवानों सर्च ऑपरेशन चलाया था। यहां फिलहाल तो बारिश नहीं हो रही है, लेकिन घने बादल जरूर छाये हुए हैं। यानी चेतक जैसे हेलीकॉप्टर से खोजना अत्यंत मुश्किल काम। हां सुखोई अपने रडार की मदद से जरूर कोई सुराग निकाल सकता है।
बात अगर जमीनी ऑपरेशन की करें तो आईटीबीपी के 250, भारतीय सेना के ढाई हजार और सरहद के उस पर भूटान के करीब 800 जवान सर्च ऑपरेशन में जुटे हुए हैं। दुर्गम पहाड़ और उनके बीच की खाईयों में किसी हेलीकॉप्टर को ढूंढ़ना उनके लिए बहुत कठिन है, लेकिन हम शुक्रगुजार हैं सेना के उन जवानों के जो विषम परिस्थितियों में भी सर्च ऑपरेशन में आगे बढ़ रहे हैं। सच पूछिए तो यहां इन जवानों की जिंदगी भी दांव पर लगी हुई है, जरा सा पैर फिसला नहीं कि सीधे खाई में।
हम प्रार्थना करेंगे कि खांडू जहां भी हों सुरक्षित हों और हमारे जवान इस सर्च ऑपरेशन में जल्दी कामयाबी हांसिल करें।












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