सरकार मॉनसून सत्र से पहले ड्राफ्ट कमेटी बनाने को राजी : अन्ना हजारे

नई दिल्ली। भ्रष्‍टाचार के खिलाफ देश के दूसरे गांधी के नाम से मशहूर अन्ना हजारे ने अपनी मुहिम के चौथे दिन कहा कि सरकार जनलोकापाल बिल के लिए ड्राफ्ट कमेटी बनाने को राजी हो गई है। मीडिया और भारी जन समूह के आगे अन्ना ने बाताया कि सरकार के साथ लगातार उनकी चर्चा जारी है। अन्ना ने कहा कि पहले तो सरकार ने कहा था कि पांच राज्‍यों में विधानसभा चुनावों की वजह से उसके पास समय नहीं है लेकिन बाद सरकार मॉनसून सत्र से पहले ड्राफ्ट कमेटी बनाने को राजी हो गई।

उन्‍होंने कहा कि कमेटी में कोई भी दागी नेता नहीं होगा और जनता की ओर से भी एक सह अध्‍यक्ष कमेटी में होगा। अन्‍ना ने अपना संकल्‍प दोहराते हुए कहा, 'हमें सरकार के सामने झुकना नहीं है। उन्‍होंने साथ ही यह भी कहा कि बिल की ड्राफ्टिंग का काम भी जल्‍दी ही शुरू होना चाहिए। सरकार ने कहा था कि ड्राफ्ट कमे‍टी को लेकर कानून मंत्रालय की ओर से आदेश पारित कर दिया जाएगा, इसपर अन्‍ना ने कहा कि मुझे चिट्ठी नहीं सरकारी आदेश चाहिए।

पिछले 4 दिन से अनशन पर बैठे अन्‍ना ने कहा कि मुझे थोड़ी कमजोरी महसूस हो रही है लेकिन घबराने की कोई जरूरत नहीं है. अभी 6 दिन तक मुझे कुछ नहीं होगा। अन्‍ना ने उम्‍मीद जताई कि शनिवार तक सरकार का दिमाग ठिकाने पर आ जायेगा। कितने अफसोस की बात है कि भारत एक कृषि प्रधान देश है और इसी देश का किसान बदहाल अवस्था में हैं।

जानिए कौन हैं अन्ना हजारे?

देश के दूसरे गांधी अन्‍ना हजारे का वास्‍तविक नाम किसन बाबूराव हजारे है। 15 जून 1938 को महाराष्ट्र के अहमद नगर के भिंगर कस्बे में जन्मे अन्ना हजारे का बचपन बहुत गरीबी में गुजरा। पिता मजदूर थे, दादा फौज में थे। दादा की मौत के सात साल बाद अन्ना का परिवार रालेगन आ गया. अन्ना के 6 भाई हैं।

परिवार में तंगी का आलम देखकर अन्ना की बुआ उन्हें मुम्बई ले गईं । वहां उन्होंने सातवीं तक पढ़ाई की। परिवार पर कष्टों का बोझ देखकर वह दादर स्टेशन के बाहर एक फूल बेचनेवाले की दुकान में 40 रुपये की पगार में काम करने लगे। इसके बाद उन्होंने फूलों की अपनी दुकान खोल ली।

छठे दशक के आसपास वह फौज में शामिल हो गए। उनकी पहली पोस्टिंग बतौर ड्राइवर पंजाब में हुई। इसी दौरान नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से उन्होंने विवेकानंद की एक पुस्‍तक 'कॉल टु दि यूथ फॉर नेशन' खरीदी और उसको पढ़ने के बाद उन्होंने अपनी जिंदगी समाज को समर्पित कर दी। उन्होंने गांधी और विनोबा को भी पढ़ा।

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