सुप्रीम कोर्ट: मिल सकती है परोक्ष इच्छामृत्यु

नई दिल्ली | इच्छामृत्यु को कानूनी रूप से वैध बनाने के लिए लंबे समय से संघर्ष कर रहे समर्थकों के लिए अरुणा शानबाग मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिया सोमवार को दिया गया फैसला खुशियां लेकर आया। सुप्रीम कोर्ट ने अरुणा मामले में तो इच्छामृत्यु देने से इंकार कर दिया लेकिन इस केस के दौरान चली लंबी सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने परोक्ष इच्छामृत्यु को कुछ मामलों में मान्य बताया है।

क्या है 'परोक्ष इच्छामृत्यु' या 'पैसिव मर्सी किलिंग'

परोक्ष इच्छामृत्यु या पैसिव मर्सी किलिंग - जब लंबे समय से दवाइयों और उपकरणो द्वारा किसी व्यक्ति को सालों से नाम मात्र को जिंदा रखा जा रहा तो उसकी पैसिव इच्छामृत्यु की याचिका मंजूर की जा सकती है। इसके लिए उस व्यक्ति को जिन आवश्यक दवाओं या उपकरणों के सहारे जीवित रखा जा रहा , वह सब कुछ धीरे-धीरे हटा लिया जाएगा जिसे उसे कृत्रिम रूप से जीवित रखने के बदले एक स्वाभाविक मौत दी जा सके।

नहीं की जा सकती एक्टिव मर्सी किलिंग

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में हर स्थिति में एक्टिव मर्सी किलिंग को नकारा है। यानी किसी भी व्यक्ति को किसी जहरीली दवा का इंजेक्शन देकर मौत की नींद सुलाना एक अपराध ही माना जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने इसके लिए दलील दी कि भारत में ऐसा कोई कानून नहीं हैं जिसके जरिए एक्टिव इच्छामृत्यु को वैध माना जाय।

सिर्फ हाई कोर्ट की मंजूरी होगी मान्य

सुप्रीम कोर्ट ने इस ऐतिहासिक फैसले को सुनाते हुए अपने निर्णय में पर्याप्त सावधानी बरती है। न्यायिक पीठ ने स्पष्ट किया है कि ऐसी किसी भी याचिका को सिर्फ हाईकोर्ट ही मंजूरी दे सकता है। इसके अलावा हाईकोर्ट भी याचिका को मंजूर करने से पहले कम से कम तीन चिकित्सकों से अमुक केस के संदर्भ में परामर्श लेकर ही फैसला दे सकेगा।

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