राजधानी में जिंदा होगी अमीर खुसरो की विरासत
इस दौरान भारत, पाकिस्तान, ईरान और कनाडा के सूफी संगीतकार दिल्ली में हुमायूं के मकबरे से सटे 14वीं सदी के अरब की सराय में जुटेंगे। फिल्मकार, कवि और डिजाइनर मुजफ्फर अली का रूमी फाउंडेशन इस कार्यक्रम का आयोजन कर रहा है, जिसका मकसद अमीर खुसरो की कविता और संगीत की विरासत को प्रोत्साहित करना है।
अली ने आईएएनएस से बातचीत में कहा, "खुसरो देश के महत्वपूर्ण सूफी कवियों में से एक हैं। हम उनकी कविता की विरासत को संभालने का प्रयास कर रहे हैं। खुसरो उन कुछ कवियों में शामिल थे, जिन्होंने सूफी कविता की संस्कृति और मुहावरों को नए ढंग से गढ़ा। वह सूफी कविता के तीसरे आयाम के जनक थे, जो अरबी और भारतीय संगीत एवं कविता का मिलाजुला रूप है।"
विश्व सूफी संगीत उत्सव में कनाडा से संगीतकार अजालिया रे, ईरान से मसूद हबीबी, पंजाब से हंस राज हंस, दिल्ली से मालिनी अवस्थी और पाकिस्तान से सामी बंधु, वजाहत हुसैन बदायूं, उस्ताद शुजात हुसैन खान, शफकत अली खान शामिल होंगे। अली ऐसे ही उत्सव का आयोजन इस साल लंदन में भी करेंगे।
उन्होंने कहा, "हमने वर्ष 2006 में बोस्टन में ऐसा ही उत्सव किया था। इस साल लंदन जाने का कार्यक्रम है। बहुत से लोग सूफी संगीत को नहीं समझते और न ही उसकी कद्र करते हैं। उनमें इसकी समझ विकसित करने की जरूरत है, ताकि वे इससे प्रेरणा ले सकें।"
सूफी के पैगम्बर खुसरो चिश्ती निजामुद्दीन औलिया के अनुयायी थे, जिन्होंने सूफी संगीत को आध्यात्म से जोड़ा और 13वीं सदी में इसे लेकर राजधानी आए। 'कव्वाली', 'खयाल' और 'तराना' के जनक खुसरो पारसी और हिन्दावी (हिंदी-उर्दू) में लिखते थे।
अली के अनुसार, सूफी संगीत से प्रेरित होकर उन्होंने इस पर कई लघु फिल्में बनाईं। 1989 में कश्मीर में हिरासत में लिए जाने के बाद उन्हें सूफी संगीत की ताकत महसूस हुई और उन्होंने यह भी जाना कि इसका मूल्य खोता जा रहा है। बकौल अली सूफी संगीत से शांति मिल सकती है, लेकिन इसका इस्तेमाल उपकरण, फैशन या व्यावसायिक रूप से नहीं किया जा सकता। यह प्राकृतिक प्रक्रिया है।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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