सबकी नज़र ममता के रेल बजट पर

ग़ौरतलब है कि सरकार का आर्थिक सर्वेक्षण भी शुक्रवार को ही संसद में पेश होगा. योजना आयोग लंबे समय से रेल मंत्रालय पर किराए और सामान के भाड़े में दोतरफ़ा सब्सि़डी कम करने का दबाव बना रहा है. लेकिन जानकारों के अनुसार ऐसा होने की संभावना बहुत कम है.
ईंधन के बढ़ते दामों और महंगाई भत्ते के चलते रेल कर्मचारियों का वेतन बढ़ रहा है और योजना आयोग की दलील है कि घाटा कम करने के लिए भाड़े में बढ़ोत्तरी ज़रूरी है. हालांकि जनवरी 2010 में हुई माल भाड़े में वृद्धि से चीनी और नमक के दाम भी 11 से 13 फ़ीसदी तक बढ़ गए थे.
भारतीय रेलवे पर आर्थिक घाटे के बादल मंडरा रहे हैं. ऐसे में रेल मंत्री के लिए सबसे बड़ी चुनौती है बिना रेल भाड़ा बढ़ाए दुनिया की सबसे बड़ी रेल सेवा को पटरी पर बनाए रखना. आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि सकल घरेलू उत्पाद में नौ फ़ीसदी की विकास दर के बाद रेलवे की विकास दर 12 से 13 फ़ासदी तक होनी चाहिए.
ऐसे में सबसे बड़ी ज़रूरत है रेलवे के आंतरिक संसाधनों का किफ़ायत से इस्तेमाल और चुस्त प्रबंधन की. साल 2010-2011 के अपने पहले रेल बजट में भी ममता बनर्जी ने किरायों में वृद्धि न करते हुए रेलवे के निजीकरण को भी ख़ारिज कर दिया था. हालांकि उन्होंने कहा था वे निजी क्षेत्र से पूँजीनिवेश और सहयोग चाहती हैं.
ममता बनर्जी ने रेलवे मिशन 2020 के तहत कई तरह की सुविधाएँ उपलब्ध कराने का आश्वासन दिया था. एसी टिकट के लिए सर्विस चार्ज में 20 रुपए की कटौती के अलावा उन्होंने रवींद्रनाथ टैगोर की याद में भारत तीर्थ के नाम से कई विशेष रेलगाड़ियाँ चलाने की घोषणा की थी. ममता बनर्जी ने 117 नई ट्रेनें शुरु करने की घोषणा भी की थी.












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