गोधरा कांड : 31 दोषी करार, मुख्य आरोपी सहित 63 बरी (राउंडअप)

अहमदाबाद, 22 फरवरी (आईएएनएस)। गुजरात के गोधरा में नौ साल पहले साबरमती एक्सप्रेस के एक डिब्बे में आग लगाए जाने की घटना के सिलसिले में मंगलवार को एक विशेष त्वरित अदालत ने 31 लोगों को दोषी करार दिया, जबकि 63 लोगों को बरी कर दिया। दोषियों को 25 फरवरी यानी शुक्रवार को सजा सुनाई जाएगी।

बरी किए गए लोगों में इस मामले का एक प्रमुख आरोपी भी है। साक्ष्य के अभाव में उसे बरी किया गया। इस घटना में 59 लोग मारे गए थे, जिनमें अधिकांश विश्व हिन्दू परिषद (विहिप) से ताल्लुक रखते थे और वे अयोध्या से लौट रहे थे। इसके बाद पूरा गुजरात दंगे की चपेट में आ गया था, जिसमें हजारों लोग मारे गए थे। देश के इतिहास के बड़े दंगों में इसकी गिनती होती है।

अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश पी.आर.पटेल ने 31 लोगों को दोषी करार दिया है। ये सभी 27 फरवरी, 2002 को साबरमती एक्सप्रेस के एस-6 कोच में आग लगाने की साजिश रचने के आरोपी थे।

विशेष लोक अभियोजक जे.एम.पांचाल ने कहा, "दोषियों को सजा 25 फरवरी को सुनाई जाएगी।"

अपने आप में यह पहली अदालत है, जिसने 2002 के गुजरात दंगे के नौ मामलों में से एक मामले में अपना फैसला सुनाया है।

सभी दोषियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 149, 302, 307, 323, 324, 325, 326, 332, 395, 397 और 436 तथा रेलवे अधिनियिम एवं पुलिस अधिनियम की कुछ धाराओं के तहत आरोप लगाए गए थे।

पांचाल ने कहा कि वह फैसले से संतुष्ट हैं। उन्होंने कहा, "यह एक न्यायिक फैसला है और हर किसी को इसका सम्मान करना चाहिए।"

मौलवी सईद उमरजी को इस घटना का प्रमुख आरोपी माना जा रहा था, लेकिन अदालत ने उन्हें बरी कर दिया है। उमरजी के बेटे सईद उमरजी ने कहा कि इस फैसले से न्यायपालिका के प्रति उसके मन में सम्मान बढ़ा है। उसने कहा, "लेकिन जिस प्रकार मेरे पिता को आठ वर्षो तक जेल में रखा गया, वह अन्याय है।"

मामले में दायर आरोप पत्र के अनुसार साबरमती एक्सप्रेस की बोगी संख्या एस-6 पर लगभग 900 से 1000 व्यक्तियों की भीड़ ने गोधरा रेलवे स्टेशन के पास 27 फरवरी, 2002 को हमला बोल दिया था, जिसमें 59 यात्री मारे गए थे।

इस घटना को एक साजिश करार दिया गया था और इसके बाद पूरे राज्य में साम्प्रदायिक दंगे भड़क गए थे जिसमें 1,000 से अधिक लोग मारे गए थे।

सर्वोच्च न्यायालय ने एक विशेष जांच दल (एसआईटी) द्वारा दंगो की जांच कराए जाने का आदेश दिया था।

विशेष अदालत ने पिछले वर्ष सितम्बर महीने में अपना फैसला सुरक्षित कर लिया था।

इस मामले में 95 आरोपी थे, जिनमें से 80 आरोपी साबरमती केंद्रीय कारागार में कैद है और 15 आरोपी जमानत पर जेल से बाहर हैं।

प्रारम्भ में सभी आरोपियों को आतंक निरोधी अधिनियम (पोटा) के तहत आरोपित किया गया था। लेकिन बाद में केंद्रीय पोटा समीक्षा समिति की सिफारिश पर गुजरात उच्च न्यायालय ने आरोपियों पर से पोटा हटा दिया था।

आरोपियों के खिलाफ जून 2009 में आरोप तय किए जाने के बाद अदालत में मामले की सुनवाई शुरू हुई थी। सुनवाई के दौरान अदालत ने अभियोजन पक्ष के 254 गवाहों से पूछताछ की थी।

कांग्रेस ने इस फैसले पर प्रतिक्रिया देने से इंकार कर दिया। वैसे कांग्रेस ने गोधरा कांड के बाद हुए साम्प्रदायिक दंगों को बढ़ावा देने के लिए मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को दोषी ठहराया है। दंगों में 1,000 से ज्यादा लोग मारे गए थे।

कांग्रेस प्रवक्ता जयंती नटराजन ने नई दिल्ली में संवाददाताओं से कहा, "हम सम्भवत: इस फैसले पर कोई टिप्पणी नहीं कर सकते क्योंकि हम वास्तव में अदालत के फैसले पर प्रतिक्रिया नहीं देते, यह न्यायिक प्रक्रिया का एक हिस्सा है।"

नटराजन ने कहा कि नरसंहार के बाद जो साम्प्रदायिक दंगे हुए वे लोकतंत्र पर एक धब्बा थे।

उन्होंने कहा, "राजनीतिक अर्थो में गोधरा कांड पर जो भी फैसला आया हो लेकिन इस घटना के बाद जो साम्प्रदायिक तनाव और हिंसा का माहौल बना था वह लोकतंत्र के ऊपर एक धब्बा था।"

उन्होंने कहा, "इस वजह से मोदी के रिकॉर्ड पर भी अब तक धब्बा है, जिसके लिए उन्हें हमेशा देश की जनता को जवाब देना होगा।"

कांग्रेस महासचिव बी. के. हरिप्रसाद ने कहा कि इस फैसले से इस बात की पुष्टि हुई है कि निर्दोष लोगों को नौ साल तक सलाखों के पीछे रखा गया। उन्होंने कहा कि किसी भी लोकतंत्र में निर्दोष लोगों को सजा नहीं मिलनी चाहिए और कांग्रेस को यह कहने में कोई हिचकिचाहट नहीं है कि दोषियों को सजा मिलनी चाहिए।

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने फैसले का स्वागत किया है। भाजपा का कहना है कि इस फैसले से केंद्र सरकार के दुर्भावनापूर्ण इरादे सामने आ गए हैं।

भाजपा प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद ने कहा कि इस फैसले से इस घटना को पूरी तरह ढकने की कोशिश करने वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार के नापाक इरादे उजागर हुए हैं।

प्रसाद ने कहा, "इससे निश्चित रूप से इस बात का आश्वासन मिला है कि कानून व न्याय मजबूत हैं। कई ऐसे तत्व थे जो इस घटना को छोटा बताने की कोशिश कर रहे थे। कई राजनेताओं ने इसका दुरुपयोग करने की कोशिश की।"

उन्होंने न्यायाधीश यू.सी. बनर्जी समिति की रिपोर्ट पर भी सवाल उठाया। इस रिपोर्ट में कोच के अंदर से आग लगने की बात कही गई थी। प्रसाद ने रिपोर्ट को झूठा करार दिया।

विश्व हिंदू परिषद (विहिप) के अंतर्राष्ट्रीय महामंत्री प्रवीण तोगड़िया अदालत द्वारा घटना को साजिश करार दिए जाने पर संतोष जताते हुए कहा कि इस कांड का मुख्य षड्यंत्रकारी मुल्ला उमर सहित 63 लोग राजनीतिक कोशिशों के चलते बरी हुए हैं।

तोगड़िया ने भोपाल में पत्रकारों से बातचीत में कहा कि जब तक सभी 94 षड्यंत्रकारियों को फांसी की सजा नहीं मिल जाती, तब तक यह नहीं माना जा सकता कि जिंदा जलाए गए 59 निर्दोषों को न्याय मिल गया है।

उन्होंने कहा, "न्यायालय के इस निर्णय का हम स्वागत करते हैं, मगर पूरे देश को दुख और गुस्सा के साथ बताना चाहता हूं कि 59 हिंदुओं को जिंदा जलाने वाले 63 जिहादियों को राजनीतिक कोशिशों से बचाया गया है।"

विहिप नेता ने गुजरात सरकार से मांग की है कि वह उमर सहित 63 लोगों को अहमदाबाद अदालत से बरी किए जाने के खिलाफ उच्च न्यायालय में अपील करे।

तोगड़िया ने बनर्जी आयोग और न्यायमूर्ति जैन पर भी जमकर हमला बोला। उन्होंने कहा कि पिछले एक दशक से षड्यंत्रकारियों को बचाने की कोशिशें चल रही हैं। बनर्जी आयोग बनाकर यह बताना कि कारसेवक खुद जल मरे और न्यायमूर्ति द्वारा आरोपियों पर से पोटा हटाना क्या सजा न दिलाने की व्यवस्था करना नहीं है?

तोगड़िया ने कहा कि गोधरा कांड के 2000 से ज्यादा लोग चश्मदीद हैं, मगर बनर्जी आयोग और न्यायमूर्ति जैन के अलावा राजनीतिक केंद्रों ने मिलकर मुल्ला उमर सहित 63 लोगों को बचाया है। उन्होंने कहा कि जब तक सभी 94 षड्यंत्रकारियों को फांसी की सजा नहीं मिल जाती, तब तक यह नहीं माना जा सकता है कि हिंदुओं को न्याय मिला है।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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