गोधरा कांड में अदालत ने 31 को दोषी ठहराया, 63 बरी (लीड-2)
ज्ञात हो कि वर्ष 2002 में गोधरा रेलवे स्टेशन के पास साबरमती एक्सप्रेस रेलगाड़ी की बोगी संख्या एस-6 में आग लगा दी गई थी, जिसमें सवार 59 यात्री जिंदा जल गए थे। मारे गए यात्रियों में से अधिकतर कार सेवक थे, जो अयोध्या से लौट रहे थे।
मौलवी सईद उमरजी को इस घटना का प्रमुख आरोपी माना जा रहा था, लेकिन अदालत ने उन्हें बरी कर दिया है।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश पी.आर.पटेल ने 31 लोगों को दोषी करार दिया है। ये सभी 27 फरवरी, 2002 को साबरमती एक्सप्रेस के एस-6 कोच में आग लगाने की साजिश रचने के आरोपी थे।
विशेष लोक अभियोजक जे.एम.पांचाल ने कहा, "दोषियों को सजा 25 फरवरी को सुनाई जाएगी।"
अपनेआप में यह पहली अदालत है, जिसने 2002 के गुजरात दंगे के नौ मामलों में से एक मामले में अपना फैसला सुनाया है।
सभी दोषियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 149, 302, 307, 323, 324, 325, 326, 332, 395, 397 और 436 तथा रेलवे अधिनियिम एवं पुलिस अधिनियम की कुछ धाराओं के तहत आरोप लगाए गए थे।
पांचाल ने कहा कि वह फैसले से संतुष्ट हैं। उन्होंने कहा, "यह एक न्यायिक फैसला है और हर किसी को इसका सम्मान करना चाहिए।"
मामले में दायर आरोप पत्र के अनुसार साबरमती एक्सप्रेस की बोगी संख्या एस-6 पर लगभग 900 से 1000 व्यक्तियों की भीड़ ने गोधरा रेलवे स्टेशन के पास 27 फरवरी, 2002 को हमला बोल दिया था, जिसमें 59 यात्री मारे गए थे।
इस घटना को एक साजिश करार दिया गया था और इसके बाद पूरे राज्य में साम्प्रदायिक दंगे भड़क गए थे जिसमें 1,000 से अधिक लोग मारे गए थे।
सर्वोच्च न्यायालय ने एक विशेष जांच दल (एसआईटी) द्वारा दंगो की जांच कराए जाने का आदेश दिया था।
विशेष अदालत ने पिछले वर्ष सितम्बर महीने में अपना फैसला सुरक्षित कर लिया था।
इस मामले में 95 आरोपी थे, जिनमें से 80 आरोपी साबरमती केंद्रीय कारागार में कैद है और 15 आरोपी जमानत पर जेल से बाहर हैं।
प्रारम्भ में सभी आरोपियों को आतंक निरोधी अधिनियम (पोटा) के तहत आरोपित किया गया था। लेकिन बाद में केंद्रीय पोटा समीक्षा समिति की सिफारिश पर गुजरात उच्च न्यायालय ने आरोपियों पर से पोटा हटा दिया था।
आरोपियों के खिलाफ जून 2009 में आरोप तय किए जाने के बाद अदालत में मामले की सुनवाई शुरू हुई थी। सुनवाई के दौरान अदालत ने अभियोजन पक्ष के 254 गवाहों से पूछताछ की थी।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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