उपचुनाव के बाद छत्तीसगढ़ कांग्रेस में गुटबाजी बढ़ी
दुर्ग जिले की संजारी बालोद विधानसभा सीट के लिए हुए उपचुनाव में कांग्रेस की 9,500 वोटों से शर्मनाक हार हुई थी। यह क्षेत्र अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) बाहुल्य है और यहां 14 फरवरी को मतदान हुआ था तथा 17 फरवरी को परिणाम घोषित किए गए थे।
इस सीट पर उपचुनाव कराने की जरूरत इसलिए पड़ी थी, क्योंकि सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के विधायक मदनलाल साहू का पिछले वर्ष अगस्त में हृदयाघात के कारण निधन हो गया था। साहू की विधवा कुमारी बाई साहू ने उपचुनाव में कांग्रेस के मोहन पटेल को पराजित किया।
ज्ञात हो कि इस राज्य में कांग्रेस नवम्बर 2003 के विधानसभा चुनाव में पराजय के बाद से ही कई खेमों एवं उपखेमों में बंटी हुई है। लेकिन संजारी बालोद सीट के लिए उपचुनाव कांग्रेस ने पूरे दम-खम के साथ लड़ा था। लेकिन पार्टी का प्रचार अभियान इसलिए मार खा गया, क्योंकि पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी यह कहते हुए प्रचार अभियान से दूर रहे कि राज्य इकाई के अध्यक्ष धनेंद्र साहू ने उन्हें प्रचार के लिए आमंत्रित नहीं किया।
लेकिन साहू ने जोगी के दावे को खारिज करते हुए कहा, "उन्हें प्रचार के लिए आमंत्रित किया गया था, लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री ने पूरे प्रचार अभियान से दूर रहने को प्राथमिकता दी।"
सूत्रों के अनुसार जोगी ने कहा था कि साहू ने प्रचार के लिए उन्हें आमंत्रण तो भेजा था लेकिन बहुत देर से। लिहाजा वह प्रचार में हिस्सा नहीं ले सके, क्योंकि उनके साले एवं मध्य प्रदेश के पूर्व मंत्री रत्नेश सोलोमन का निधन हो गया था।
लेकिन कांग्रेस के एक सूत्र ने कहा, "साहू ने जानबूझ कर जोगी को देर से निमंत्रण भेजा था, क्योंकि वह मानते थे कि कांग्रेस जोगी के बगैर ही उपचुनाव जीत सकती है, वह भी खासतौर से दुर्ग में, क्योंकि यह कांग्रेस के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष मोतीलाल वोरा का गृह जनपद है।"
सूत्र ने कहा, "जोगी भी यह साबित करना चाहते थे कि कांग्रेस उनके समर्थन के बगैर चुनाव नहीं जीत सकती, भले ही वह वोरा का गृह जनपद क्यों न हो, इसलिए वह प्रचार से दूर बने रहे।"
जोगी के अंध भक्त एक कांग्रेसी विधायक ने कहा, "जोगी ने इस उपचुनाव में साबित कर दिया है कि इस राज्य में बगैर उनके कांग्रेस का कोई भविष्य नहीं है। राज्य में कांग्रेस के कई नेता यह सोचते थे कि जोगी के दिन बीत चुके हैं, लेकिन चुनाव परिणाम बताते हैं कि जोगी अभी भी इस राज्य में कांग्रेस के चेहरा हैं।"
लेकिन पार्टी में जोगी विरोधी विभिन्न खेमे अखबारों की कतरने जुटाने में लगे हुए हैं और जल्द ही वे उसे केंद्रीय नेतृत्व को सौंपेंगे। इसके जरिए वह यह समझाने की कोशिश करेंगे कि जोगी ने अपने विश्वस्त सहयोगी और पूर्व मंत्री मनोज मंडावी के जरिए किस तरह कांग्रेस की जीत को हार में बदल दिया, क्योंकि मंडावी ने पार्टी से जुड़े जनजातियों के वोट का एक बड़ा हिस्सा एक जनजातीय संगठन द्वारा समर्थित उम्मीदवार को दिलवा दिया।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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