पीएलए से मुक्त किए गए 4,000 सैनिकों का भविष्य अंधकारमय
काठमांडू, 14 फरवरी (आईएएनएस)। ऐसे समय में जब नेपाल के माओवादी अपने 'जन युद्ध' की 15वीं बरसी मना रहे हैं, कोई चार हजार ऐसे सैनिकों को उन्होंने लगभग भुला दिया है, जिन्होंने समतावादी समाज की स्थापना और दुनिया को बदलने की तमन्ना के साथ अपना जीवन 'जन युद्ध' में झोक दिया था।
बिजेता श्रेष्ठा भी उन्हीं में से एक हैं। वह दुनिया को बदलना चाहती थीं, अन्याय को समाप्त करना चाहती थीं और समतावादी समाज की स्थापना में मदद करना चाहती थीं। लेकिन आज वह काठमांडू के एक होटल में कूकिंग सहायक के रूप में काम करती हैं, दूसरी ओर उन्हीं की पार्टी के शीर्ष नेता आलीशान रात्रिभोजों में शिरकत करते हैं। इन नेताओं को बिजेता जैसे हजारों लोगों की आज कोई परवाह नहीं है, जिन्हें मात्र 3,000 नेपाली रुपये प्रति माह पर गुजारा करना पड़ता है।
इस मामले में बसंत चौधरी थोड़े भाग्यशाली हैं। माओवादियों ने अपने 10 वर्षो के सशस्त्र संघर्ष के दौरान बसंत को बाल सैनिक के रूप में भर्ती किया था। बसंत इस समय 21 वर्ष के हो चुके हैं और चार वर्ष पहले पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) से उन्हें मुक्त कर दिया गया था। संयुक्त राष्ट्र द्वारा शुरू किए गए मोबाइल टेलीफोन मरम्मत प्रशिक्षण कार्यक्रम के तहत प्रशिक्षित बसंत अब अपना भविष्य संवारने में सक्षम हो गए हैं।
बसंत पीएलए से मुक्त किए गए एक अन्य बाल सैनिक बुद्धा के साथ मिलकर सुरखेत में मोबाइल मरम्मत की एक दुकान चलाते हैं। सुरखेत पश्चिमी नेपाल का एक जिला है, जो माओवादियों के जन युद्ध के दौरान सर्वाधिक प्रभावित था।
शीर्ष माओवादी नेताओं ने रविवार को चाय पार्टी के साथ जन युद्ध की 15वीं बरसी मनाई और राजधानी काठमांडू के विभिन्न रणनीतिक स्थलों पर दीपक जलाए। लेकिन इन समारोहों में मुक्त किए गए 4,008 सैनिकों की कोई पूछ नहीं थी। जबकि इनमें से अधिकांश को अंतर्राष्ट्रीय नियमों के विरुद्ध पीएलए में बाल सैनिक के रूप में भर्ती किया गया था और शांति समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद उन्हें पीएलए से दूध की मक्खी की तरह निकाल फेका गया था।
पार्टी और सरकार द्वारा ठुकराए जाने के बाद खाली हाथ घर लौटे ये पूर्व लड़ाके अब सामाजिक कलंक, भय, बेरोजगारी, स्वास्थ्य समस्याओं और मानसिक तनाव से जूझ रहे हैं।
वह तो नार्वे और ब्रिटेन जैसी पश्चिमी सरकारों की पहल का परिणाम है कि नेपाल के लिए 90 लाख डॉलर का शांति कोष स्थापित किया गया। संयुक्त राष्ट्र और इसकी साझेदार यूनीसेफ व अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन जैसी एजेंसियां इस कोष का इस्तेमाल कर मुक्त किए गए लड़ाकों को या तो वापस स्कूल भेजने या फिर उन्हें रोजगार परक प्रशिक्षण मुहैया कराने में मदद कर रही हैं।
प्रशिक्षण ले रहे प्रत्येक पूर्व लड़ाकों को स्थापित कोष से 3,000 रुपये प्रति माह दिया जाता है और प्रति दिन तीन भोजन दिए जाते हैं, जबकि महिलाओं को 4,000 नेपाली रुपये प्रदान किए जाते हैं। इनमें से कई सारी महिलाओं के बच्चे हैं और उनके परिवारों ने उन्हें स्वीकार करने से इंकार कर दिया है।
नेपाल में संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम के प्रमुख रॉबर्ट पाइपर ने कहा, "यह हृदय विदारक है। पीएलए से 4,008 लड़ाकों को मुक्त किए जाने के बाद कई दम्पति एक-दूसरे से अलग हो गए हैं। यहां अभी भी 19,000 से अधिक पीएलए लड़ाके हैं और उनमें कई मामले ऐसे हैं कि या तो पति या पत्नी अभी भी छावनियों में हैं।"
जहां 19,000 से अधिक पीएलए लड़ाके अभी भी इस उम्मीद में हैं कि उन्हें सेना में शामिल कर लिया जाएगा, क्योंकि माओवादी नेताओं ने उन्हें वादा किया था, लेकिन मुक्त कर दिए गए 4,008 लड़ाकों के तो सपने टूट चुके हैं। उन्हें पीएलए से इसलिए मुक्त कर दिया गया, क्योंकि या तो बच्चों के रूप में उनकी भर्ती की गई थी, या तो युद्ध की समाप्ति के बाद।
पीएलए से मुक्त किए गए एक सैनिक ने पिछले सप्ताह अधिक भत्ते की मांग को लेकर पश्चिमी नेपाल के दूरवर्ती धनगाडी जिले में स्थित संयुक्त राष्ट्र कार्यालय में तोड़फोड़ की थी।
मुक्त किए गए कुल 4,008 सैनिकों में से मात्र 578 ने प्रशिक्षण पूरा किया है और 763 फिलहाल या तो प्रशिक्षण ले रहे हैं या पढ़ाई कर रहे हैं। लेकिन इन पूर्व लड़ाकों की बड़ी संख्या अभी भी अनिर्णय की स्थिति में है और संयुक्त राष्ट्र इस बात को लेकर चिंतित है कि नामांकन की अंतिम तारीख 22 मार्च तक यदि ये पूर्व लड़ाके अपने नामांकन नहीं करा पाए तो उनका भविष्य अंधकारमय हो जाएगा।
इस रास्ते में बड़ी बाधा नेपाल की कमजोर सरकारें हैं। ये सरकारें इन सैनिकों के पुनर्वास में कोई रुचि नहीं ले रही हैं। वे केवल सत्ता में बने रहने के लिए संघर्षरत हैं।
संयुक्त राष्ट्र में वरिष्ठ पुनर्वास सलाहकार, डेसमंड जे.मोलोय ने खेद जताते हुए कहा, "पुनर्वास कार्यक्रम राष्ट्रीय स्वामित्व के बगैर शुरू हुए थे। लेकिन यह संयुक्त राष्ट्र का कोई कार्यक्रम नहीं है। यह एक नेपाली प्रक्रिया है और सरकार, माओवादियों व समुदाय को इसकी जिम्मेदारी लेनी चाहिए।"
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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