मिस्र में मुबारक-बाद की सुबह

शुक्रवार शाम राष्ट्रपति होशनी मुबारक ने अपना इस्तीफ़ा सौंप दिया और अब अपनी पत्नी के साथ लाल सागर के किनारे बसे शर्म अल शेख में बने अपने महल में पहुंच गए हैं.ये अभी स्पष्ट नहीं है कि वो मिस्र में ही रहेंगे या देश छोड़ देंगे.
अठारह दिनों से चल रहे विरोध प्रदर्शनों के बाद मिस्र की जनता जब शनिवार की सुबह जगी है तो उन्हें यकीन नहीं हो रहा है कि मुबारक ने गद्दी छोड़ दी है.रात भर काहिरा और अन्य शहरों में जश्न मना है, आतिशबाज़ी हुई है, लोगों ने गाड़ियों के हार्न बजाकर अपनी खुशी का इज़हार किया है.
तारीख़ दर तारीख़--क्या कैसे हुआ
मुबारक के सफ़र पर नज़र
शनिवार की सुबह तहरीर चौक पर एक बार फिर लोग जमा होना शुरू हो गए हैं.
चल दिए मुबारक
लोग मिस्र का झंडा लहरा रहे हैं और तहरीर चौक पर छोटे-छोटे गुट लाउडस्पीकरों का एलान कर रहे हैं.कई लोगों का कहना है कि होस्नी मुबारक को आसानी से देश छोड़ देने की इजाज़त नहीं दी जानी चाहिए और उनके ख़िलाफ़ मुकदमा चलना चाहिए.
कुछ लोग तो इतने नाराज़ हैं कि यहां तक कह रहे हैं कि मुबारक को फांसी दे दी जानी चाहिए.स्विटज़रलैंड ने एलान कर दिया है कि वो अपने बैंकों में होस्नी मुबारक और उनके परिवार के खातों को सील कर रहे हैं.
वहां के विदेश मंत्री ने ये मुबारक के इस्तीफ़े के ठीक आधे घंटे बाद ही इसका एलान कर दिया.उप-राष्ट्रपति उमर सुलेमान ने एलान कर दिया है कि मिस्र में राष्ट्रपति का कार्य अब वहां की प्रभावशाली सैन्य परिषद संभालेगी.
पश्चिमी देशों ने सेना से अपील की है कि वो सुनिश्चित करे कि लोकतंत्र का रास्ता शांतिपूर्ण हो.
मुबारक के बाद कई सवाल?
अरब लीग के सेक्रेटरी जनरल अम्र मूसा ने कहा है कि ये एक मौका है देश को एकजुट करने का और लोकतंत्र के आधार पर भविष्य की नींव रखने का.विपक्षी मुस्लिम ब्रदरहुड के एक नेता एसाम अल एरियन ने कहा है कि मिस्र एक नया राजनीतिक मॉडल खड़ा करेगा.
जश्न जारी है लेकिन चुनौतियां अभी बहुत सी हैं.दो सैनिक अधिकारी जो सैन्य परिषद के सदस्य हैं मिस्र में और ताक़तवर बनकर उभरे हैं. ये हैं फ़ील्ड मार्शल मोहम्मद हुसैन तंतावी और लेफ़्टिनेंट जनरल समी हाफ़िज़ एनान.
दोनों ही उसी गुट के सदस्य हैं जिन्हें होस्नी मुबारक के रहने से फ़ायदा था. और यही परिषद सितंबर में होनेवाले चुनावों तक देश चलाएगी.काहिरा की सड़कों पर सवाल ये उठ रहा है कि क्या वो जनता के साथ सत्ता की भागीदारी का कोई रास्ता ढूंढ सकेंगे?दोनों ही अधिकारियों के बारे में कहा जा रहा है कि दोनों में से कोई भी लोकतंत्र का बहुत बड़ा समर्थक हो ऐसा नहीं है.
लेकिन अंदाज़ा है कि दोनों ही इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि एक कमज़ोर राष्ट्रपति के साथ खड़े होने की बजाए सेना की विश्वसनीयता और उसके कद को बचाना ज़्यादा बेहतर होगा.थिंक टैंक रॉयल यूनाइटेड सर्विसेज़ इंस्टीट्यूट में कार्यरत शशांक जोशी का कहना है कि सही मायने में यदि लोकतांत्रिक बदलाव होते हैं तो इसका सबसे ज़्यादा आर्थिक और राजनीतिक नुकसान सेना को ही होगा.
इसलिए कई लोग ये सवाल भी उठा रहे हैं कि कहीं जश्न की शुरूआत जल्दबाज़ी में तो नहीं हो गई?अमरीका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने कहा है कि आनेवाले दिनों में मिस्र के लोगों के सामने काफ़ी मुश्किल चुनौतियां हैं.और इसलिए जब जश्न थमेगा, आतिशबाज़ी रूकेगी तो प्रदर्शनकारियों को रूककर, ठहरकर देखना होगा कि जो उन्होंने हासिल किया है उसे अपने अंजाम तक कैसे पहुंचाया जाए.












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