जनगणना 2011 : देश की आबादी को जोड़ने की अहम कवायद

जनगणना हर एक दशक बाद की जाती है। पिछली जनगणना 2001 में हुई थी। इन दस सालों में सिर्फ लोगों की संख्या ही नहीं, बल्कि उनकी जिंदगी में हुए बदलावों की जानकारी भी इसी जनगणना के जरिए मिलेगी।

इस बार की जनगणना का दूसरा चरण नौ से 28 फरवरी के बीच होगा, जिसमें घर-घर जाकर लोगों की गिनती करने के साथ उनकी आर्थिक-सामाजिक दशा को भी दर्ज किया जाएगा। इससे पहले जनगणना के प्रथम चरण में मई-जून 2010 में मकानों की गिनती कर उन्हें सूचीबद्ध किया गया था। अब बारी मकान के भीतर रहने वाले परिवारों के बारे में जानकारी लेने की है। दूसरे चरण के आखिर में उन बेघरों की भी गिनती होगी, जिन्हें रहने के लिए छत भी नसीब नहीं है। 28 फरवरी की मध्यरात्रि को ऐसे लोगों की गिनती की जाएगी।

जनगणना की पुरानी परंपरा :

करीब 800-600 ईसा पूर्व में ऋग्वेद काल के दौरान जनगणना के पहले प्रमाण मिलते हैं। उस समय लोग छोटे-छोटे समुदायों में दूर-दराज के गांवों में रहते थे, देश की आबादी छितरी हुई थी। जैसे-जैसे जनसंख्या बढ़ी, गांव शहरों में तब्दील होते गए। ईसा पूर्व सातवीं से चौथी शताब्दी के दौरान लिखे गए बौद्ध धर्मग्रंथों में यह साफ कहा गया है कि उस समय भारत की आर्थिक स्थिति मध्यकालीन यूरोप से भी बेहतर थी। एक छोटे शहर में 30 से 100 परिवार रहते थे, जबिक उत्तर भारत में लगभग 20 शहर आबाद हो चुके थे। ये जानकारियां जनगणना के जरिए लोगों की जिंदगी को करीब से जाने बगैर सम्भव नहीं थीं।

आंकड़ों में छिपा रहस्य :

जनगणना के आंकड़े कई तरह के रहस्यों को छिपाए रहते हैं। मुगल सम्राट अकबर को इसकी अहिमयत के बारे में जानकारी थी। उस समय हुई जनगणना में लोगों की आर्थिक स्थिति की जानकारी लेने के साथ ही उद्योग व कारोबार से जुड़े आंकड़े भी जुटाए गए। बाद में यही जानकारियां प्रशासन को बेहतर बनाकर मुगल काल को स्वर्णिम बनाने में मददगार बनीं।

जनगणना के काम को आधुनिक स्वरूप में शुरू करने का श्रेय ब्रिटिश शासन को जाता है, जिसने प्रश्नावलियों और अनुसूचियों के साथ 1871-72 में पहली बार इस काम को अंजाम दिया। वैसे आबादी की गिनती का यह काम अंग्रेजों के अधिपत्य वाले क्षेत्रों में भी पूरी तरह से नहीं हो सका था लेकिन इससे मिले सबक ने 1882 में पहली देशव्यापी जनगणना की नींव रखी। इसमें शहरी और ग्रामीण आबादी को अलग-अलग रखते हुए व्यवसाय, शिक्षा, धर्म, जाति, विस्थापन और निशक्तता जैसे बिंदुओं को जोड़ा गया। आजादी के बाद 1948 में जनगणना कानून पारित हुआ और इसके एक साल बाद ही केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन रजिस्ट्रार जनरल और जनगणना आयुक्त की नियुक्ति हुई।

क्यों खास है इस बार की जनगणना :

यह देश की 15वीं जनगणना है, जिसके साथ ही 'नेशनल पॉपुलेशन रजिस्टर' (एनपीआर) बनाने का काम भी शुरू हो चुका है। इस रजिस्टर में हर नागरिक का नाम पूरी जानकारी के साथ दर्ज होगा और इसी के आधार पर उसे एक अद्वितीय पहचान पत्र दिया जाएगा। इसे देखते हुए जनगणना 2011 को मानव इतिहास का सबसे बड़ा अभियान कहा जा सकता है। देश के 28 राज्यों व आठ केंद्र शासित प्रदेशों के 640 जिलों में 21 लाख जनगणनाकर्मी नौ से 28 फरवरी तक घर-घर जाकर इस काम को पूरा करेंगे। लिंगानुपात और निशक्तता इस बार की जनगणना के सबसे प्रमुख बिंदु हैं। इसके अलावा व्यक्ति की शैक्षणकि स्थिति, किरायाभोगी या अल्पकालिक कर्मचारी होने, विस्थापन का पता लगाने और स्त्री व पुरुष के साथ एक तीसरा लिंग भी शामिल करने जैसे नए कदम उठाए गए हैं।

आबादी के प्रत्येक हिस्से तक सरकारी योजनाओं का लाभ पहुंचाने, कृषि व शहरी विकास योजनाओं की धनराशि के निर्धारण व आकलन और लम्बी अवधि की विकास रणनीति बनाने में जनगणना से मिलने वाली जानकारियां बेहद अहम हैं। इसके साथ ही संसदीय व विधानसभा क्षेत्रों के नए सिरे से परिसीमन व उनमें आरक्षण के नियम लागू करने में भी ये आंकड़े अहम भूमिका निभाते हैं। इससे साफ है कि जनगणना का काम सभी देशवासियों की तरक्की से जुड़ा है।

29 सवाल बताएंगे देश का हाल :

जनगणना का सबसे अहम हिस्सा होता है परिवार अनुसूची। इसमें घर के सभी सदस्यों की उम्र, शिक्षा, वैवाहिक स्थिति आदि बिंदुओं पर सवाल पूछे जाते हैं। इस बार सवालों की संख्या 29 है। इन सवालों के जवाब ही देश का असली हाल बयां करेंगे।

जनगणना 2011 की प्रमुख खासियतें :

- दुनिया का सबसे बड़ा अभियान। 2200 करोड़ रुपये का खर्च। प्रति व्यक्ति लागत 18.33 रुपये। दुनिया की सबसे किफायती जनगणना।

- देश के 28 राज्यों, सात केंद्र शासित प्रदेशों के 640 जिलों की 5961 तहसीलों के प्रत्येक ब्लॉक में 21 लाख जनगणनाकर्मी जुटेंगे इस काम में।

- सड़क और फुटपाथ पर रहने वाले बेघरों की गणना 28 फरवरी की मध्यरात्रि को शुरू होगी। एक मार्च को इस काम का पुनरीक्षण किया जाएगा।

- स्कूलों में भी जनगणना का काम होगा। मध्यप्रदेश के सभी 50 जिलों के 1.15 लाख स्कूलों में विशेष किट बांटे गए हैं। इसके अलावा कक्षा छह से कक्षा आठ तक के बच्चों के पाठ्यक्रम में जनगणना के महत्व के रूप में विशेष अध्याय भी जोड़ा गया है।

- फोन, एसएमएस, वेबसाइट, टीवी विज्ञापनों और फेसबुक, ट्विटर जैसी सोशल नेटवर्किं ग साइट्स के जरिए भी लोगों को जनगणना के बारे में जानकारी देने का इंतजाम किया गया है।

- हर जिले में एक नियंत्रण कक्ष बनाया गया है।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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