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अदालत ने फिर भी कहा कि इस तरह की भावना बनी हुई है कि नौकरशाह सैन्य कर्मियों के परिवारों के प्रति संवेदनहीन हैं।
सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति मरक डेय काटजू और न्यायमूर्ति बी.एस.चौहान की पीठ ने कहा, "यहां इस तरह की भावना है कि नौकरशाह सैन्य कर्मियों का ख्याल नहीं रखते।"
अदालत ने कहा कि अंतिम निर्णय चाहे जो भी हो, लेकिन सैन्य कर्मियों को महसूस होना चाहिए कि उनके मामले की ठीक से सुनवाई की गई और उस पर विचार किया गया।
अदालत ने कहा, "किसी भी शिकायत की सुनवाई होनी चाहिए, भले ही फैसला पीड़ित सैन्य कर्मी के खिलाफ ही क्यों न आए।"
ज्ञात हो कि धरम चंद 1937 में ब्रिटिश इंडिया आर्मी में शामिल हुए थे और 1946 में जूनियर कमीशंड आफिसर के रूप में उनकी प्रोन्नति हो गई थी। उन्हें 1948 में स्थायी कमीशन प्रदान किया गया था।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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