पॉस्को परियोजना को शर्त सहित मंजूरी
नई दिल्ली। पर्यावरण मंत्रालय ने सोमवार को दक्षिण कोरिया की इस्पात कम्पनी पॉस्को की उड़ीसा में इस्पात संयंत्र लगाने की योजना को सशर्त मंजूरी दे दी। इसके बाद उड़ीसा सरकार ने कहा कि वह जल्द ही परियोजना के लिए भूमि का अधिग्रहण शुरू करेगी। उधर पर्यावरणविदों ने इसे दुर्भाग्यपूर्ण बताया और विरोध प्रदर्शन करने की बात कही।
पॉस्को की की परियोजना में 12 अरब डॉलर का निवेश किया जाएगा, जो देश में अब तक का सबसे बड़ा प्रत्यक्ष विदेशी निवेश होगा।योजना के तहत कम्पनी इस्पात, खनन और बंदरगाह परियोजना में निवेश करेगी। तीनों परियोजनाओं के लिए अलग-अलग मंजूरी ली जानी थी। इसके अलावा कम्पनी इस्पात परियोजना के लिए बिजली आपूर्ति हेतु एक कैप्टिव बिजली संयंत्र भी लगाएगी।
मंत्रालय ने 50 पृष्ठों के आदेश में स्टील-सह-कैप्टिव बिजली संयंत्र को पर्यावरण मंजूरी देने के लिए इस पर 28 अतिरिक्त शर्ते लागू कर दीं। साथ ही राज्य के छोटे कैप्टिव बंदरगाह को पर्यावरण मंजूरी देते हुए इस पर 32 अतिरिक्त शर्तें लगा दीं।पर्यावरण एवं वन मंत्री जयराम रमेश ने कहा कि निश्चित रूप से पॉस्को जैसी परियोजना का देश के लिए आर्थिक, प्रौद्योगिकी और रणनीतिक महत्व है, लेकिन पर्यावरण और वन कानूनों को भी लागू करना जरूरी है।
उड़ीसा की राजधानी भुवनेश्वर से 100 किलोमीटर दूर जगतसिंहपुर जिले की परियोजना के लिए भूमि हस्तांतरण के मामले पर मंत्रालय ने राज्य सरकार को क्षेत्र के वनवासियों को एक सम्पूर्ण पैकेज देने के लिए कहा है।पॉस्को इंडिया के प्रबंध निदेशक जी. डब्ल्यू. सुंग ने एक बयान में कहा कि वह प्रभावित लोगों के लिए स्थायी रोजगार की व्यवस्था करेगी।उन्होंने कहा कि कम्पनी क्षेत्र के विशेष पर्यावास की रक्षा करेगी और और पुनर्वास पैकेज द्वारा परियोजना से प्रभावित होने वाले लोगों के रोजगार की व्यवस्था की जाएगी।
मंत्रालय ने पॉस्को परियोजना के इस्पात संयंत्र को मंजूरी देने के साथ जो शर्ते लगाई हैं, उनमें वायु की गुणवत्ता को बरकरार रखना, जल की जरूरतों से सम्बंधित अध्ययन करवाना, संयंत्र के कुल क्षेत्र के 25 फीसदी हिस्से को हरित क्षेत्र बनाना, आपदा और जोखिम प्रबंधन की योजना तैयार रखना और सलाना शुद्ध लाभ का दो फीसदी हिस्सा सामाजिक जिम्मेदारी (सीएसआर) पर खर्च करना शामिल हैं।
छोटे कैप्टिव बंदरगाह को मंजूरी देने के साथ जो शर्ते लगाई गई हैं, उनमें तेज क्षरण वाले क्षेत्रों में कोई निर्माण नहीं, समुद्र तट को होने वाले सम्भावित नुकसान से बचाने के उपाय अपनाना, जलीय पर्यावरण के संरक्षण के लिए एक विस्तृत योजना बनाकर जमा करना और मछलियों पर जीविका के लिए आश्रित लोगों को होने वाले नुकसान की भरपाई करना, आदि शामिल हैं।
मंत्रालय ने कहा कि वह इन शर्तो के पालन पर नजर बनाए रखेगी। मंत्रालय ने पहले वन और पर्यावरण कानूनों के उल्लंघन का हवाला देकर परियोजना की मंजूरी पर रोक लगा रखी थी। परियोजना को मंजूरी देने के लिए मंत्रालय पर काफी दबाव था। पिछले साल उड़ीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने भी इस मामले में हो रही देरी पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मुलाकात की थी।
उड़ीसा की सरकार ने कहा कि जल्द ही अब वह परियोजना के लिए भूमि का अधिग्रहण शुरू कर देगी।राज्य के इस्पात और खनन मंत्री रघुनाथ मोहंती ने आईएएनएस से कहा कि मंजूरी देर से मिली, फिर भी वे इसका स्वागत करते हैं। पॉस्को परियोजना सिर्फ उड़ीसा के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे रोजगार और आर्थिक गतिविधि बढ़ेगी।
इस बीच पर्यावरणविदों ने मंत्रालय के फैसले को दुर्भाग्यपूर्ण बताया। पॉस्को प्रतिरोध संग्राम समिति ने कहा कि वह फैसले के विरुद्ध देशव्यापी प्रदर्शन करेगी।
समिति के प्रवक्ता प्रशांत पेक्रे ने आईएएनएस से कहा कि वह दिल्ली में प्रदर्शन करेगी और विस्थापन के शिकार सभी लोग उनका साथ देंगे।
पर्यावरणविद ऋत्विक दत्ता ने कहा कि पर्यावरण मंत्री चाहे जितनी भी शर्ते लगा दें, लेकिन शर्तो के पालन का रिकार्ड बहुत खराब है।
पॉस्को को अपनी परियोजना के लिए 4,004 एकड़ भूखंड की जरूरत है, जिसमें 2,900 एकड़ चिह्न्ति भूखंड वन क्षेत्र में पड़ता है।
स्थानीय निवासी पान की खेती उजड़ जाने और विस्थापन के भय से परियोजना का विरोध कर रहे हैं।
पॉस्को और सरकार का कहना है कि परियोजना से क्षेत्र में समृद्धि आएगी।
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