जीवन की अलग संरचना भी है संभव

कैलिफ़ॉर्निया की झील में पाए गए इस जीवाणु ने फ़ॉस्फ़ोरस को बदल कर उसकी जगह ज़हरीले रसायन आर्सेनिक को अपने तत्वों में शामिल कर लिया है.जैविक-रसायन शास्त्र के इस स्वर्णिम नियम का उल्लंघन करता हुआ कोई उदाहरण अबतक नहीं मिला था.
इस खोज से ये समझा जा सकता है कि दूसरे ग्रहों पर अलग-अलग रसायनिक घटकों से मिलकर बने जीवाणु और जीवन संरचनाएं मौजूद हो सकती हैं.विज्ञान से जुड़े मामलों की पत्रिका 'साइंस' में छपी ये खोज लंबे समय से चले आ रहे इस विचार को बल देती है कि दूसरे ग्रहों पर अगर कोई ज़िंदगी है तो इसकी संभावना है कि उसके रासायनिक तत्त्व धरती पर मौजूद जीवों के रासायनिक तत्त्व से बिल्कुल भिन्न हों.
इसका प्रभाव इस बात पर भी पड़ेगा कि धरती पर जीवन का विकास कैसे और कितनी बार हुआ.ये जीवाणु कैलिफ़ॉर्निया के एक खारे पानीवाले झील में पाया गया है.हाँलाकि जीवाणु काफ़ी विषम परिस्थितियों वाले मौसम और पर्यावरण की स्थिति में पाए जाते हैं, और वो ऐसी चीजें भी पचा जाते हैं जो आमतौर पर दूसरे जीवों के लिए ज़हरीला होता है, जीवाणु की इस प्रजाति ने ज़हरीला माने जानेवाले आरसीनिक रसायन को अपने कोशिकीय तंत्र में ही शामिल कर लिया है.
इस जीवाणु का अंदाज़ा उस खोज के दौरान चला जब ये पता लगाने की मुहिम शुरू हुई थी कि जीवन के लिए ज़रूरी तत्त्वों में अबतक पहले से प्राप्त जानकारियों के अलावा और क्या बिल्कुल अलग कारण रहे होंगे.इस शोध पर काम करनेवालों में से एक, पॉल डेविस ने कहा, ''इस समय हमें इसका अंदाज़ा नहीं है कि जीवन और उसका विकास महज़ एक इत्तफ़ाक था जो सिर्फ़ धरती तक ही सीमित है या फिर ये कि ये हमारे ब्रह्मांड में बदलाव की सामान्य प्रक्रिया है जहाँ ज़िंदगी ख़ुद-ब-ख़ुद कहीं भी वैसे ही शुरू हो जाती है जब उसे धरती पर सा माहौल मिलता है.''
इस शोध को अंजाम देनेवाले वैज्ञानिकों ने उस जीवन के आरंभ का, जैसा कि हम उसे जानते हैं, एक वैकल्पिक कार्यक्रम तैयार किया था.इनका मानना था कि शायद ऐसा जीवन संभव हो, जहाँ फ़ौसफ़ोरस और फ़ौसफ़ेट की जगह साधारण तौर पर ज़हरीला माने जानेवाले ज़हरीले आर्सेनिक का इस्तेमाल किया जा सके.इसकी जाँच-परख करने के लिए शोधकर्त्ताओं ने दूसरे वैज्ञानिकों के साथ मिलकर कैलिफ़ौर्निया के मोनो झील में मौजूद जीवाणुओं पर शोध करना शुरू किया. इस झील के पानी में बड़ी मात्रा में आर्सेनिक है.
शोधकर्त्ताओं ने इस जीवाणु को प्रयोगशाला में भी ले जाकर आर्सेनिक के उच्च स्तर में रखा और उन्हें ये देखकर आश्चर्य हुआ कि इन जीवाणुओं ने आर्सेनिक को ख़ुद में पूरी तरह से आत्मसार कर लिया है.












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