मनुष्य को गोरिल्ला से हुआ था मलेरिया का संक्रमण
इस नए शोध के बाद मलेरिया के इलाज के लिए नया टीका बनाने में मदद मिल सकती है। इस बीमारी से हर साल 15 लाख लोगों की मौत हो जाती है जबकि 50 करोड़ से ज्यादा इससे पीड़ित होते हैं।
इस शोध से यह भी स्पष्ट हुआ है कि एचआईवी, एवियन और स्वाइन फ्लू जैसी बीमारियां जानवरों से मानवों में कैसे पहुंचीं।
समाचार पत्र 'डेली मेल' के मुताबिक वैज्ञानिकों ने अफ्रीका में 2,500 गोरिल्लाओं के मल के नमूनों का विश्लेषण किया था और उन्होंने उसमें मनुष्य में मलेरिया फैलाने वाले परजीवी पी. फेल्सीपेरम के डीएनए के अंश देखे।
अफ्रीका, दक्षिणी सहारा में पी. फेल्सीपेरम से होने वाला मलेरिया बहुत सामान्य है। यह एक प्रकार का जानलेवा मलेरिया होता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के मुताबिक मलेरिया से होने वाली सबसे ज्यादा मौतों पी. फेल्सीपेरम के कारण ही होती हैं।
अमेरिका के अलबाना विश्वविद्यालय के शोधकर्ता वीमिन ल्यू कहते हैं कि उनका शोध बताता है कि पी. फेल्सीपेरम की उत्पत्ति चिम्पांजी से ज्यादा गोरिल्ला के नजदीक है।
अब तक यही ज्ञात था कि चिम्पांजी में पी. फेल्सीपेरम का नजदीकी परजीवी पी. रिचीनोवी पाया जाता है। इसी के आधार पर ऐसा माना जाता था कि मनुष्य में चिम्पांजी से मलेरिया आया है।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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