अयोध्या विवाद : मुद्दा वही, पर बदल गए हैं पात्र

नई दिल्ली, 19 सितम्बर (आईएएनएस)। राम मंदिर आंदोलन से ही लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती, विनय कटियार और कल्याण सिंह सरीखे नेताओं की फौज निकली थी, लेकिन आज जब इस विवादास्पद मुद्दे पर फैसले की घड़ी नजदीक आ गई है तो इनमें से अधिकांश नेता या तो शांत दिख रहे हैं या फिर वर्तमान परिदृश्य से गायब।

उल्लेखनीय है कि राम जन्म भूमि-बाबरी मस्जिद विवाद पर आगामी 24 सितम्बर को इलाहाबाद उच्च न्यायालय का फैसला आने वाला है।

आडवाणी, जोशी, कटियार, उमा और कल्याण जैसे नेता संघ के वरदहस्त से इसी आंदोलन के जरिए ही राष्ट्रीय राजनीति के शिखर पर पहुंचे थे लेकिन आज ये नेता अलग-अलग भूमिका में आ गए हैं।

आडवाणी अब मार्ग दर्शक की भूमिका निभा रहे हैं। संभवत: इसलिए वह सभी से शांत रहने की अपील कर रहे हैं। आडवाणी ने पिछले दिनों भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) संसदीय दल की बैठक में सभी सांसदों से इस मसले पर बेवजह टिप्पणी न करने की सलाह दी थी।

मुरली मनोहर जोशी भी इस बार शांत दिख रहे हैं। उन्होंने आईएएनएस से बातचीत में कहा, "हम लोगों में स्पष्ट राय बनी है कि अदालत का निर्णय आने तक कुछ भी नहीं कहना और न ही कुछ करना है।"

अदालत के फैसले के मद्देनजर 1992 जैसी बन रही स्थिति के बारे में वह कहते हैं, "यह सब मीडिया का दिमागी फितूर है। मीडिया एक माहौल बना रहा है। वातावरण को बिगाड़ने की कोशिश हो रही है। वास्तविकता में ऐसा कुछ भी नहीं है।"

यह पूछे जाने पर कि क्या आडवाणी और उनके सरीखे नेता इस बार परदे के पीछे की भूमिका निभा रहे हैं। उन्होंने कहा, "परदे के आगे और पीछे क्या होता है। हमें कुछ करने के लिए परदे के आगे-पीछे की जरूरत नहीं है।"

राम मंदिर आंदोलन के ये रथी इस बार शांत दिख रहे हैं तो उमा भारती और कल्याण सिंह वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य से ओझल हैं। दोनों भाजपा से बाहर हैं और दोनों में वह दमखम भी नदारद है। राम मंदिर आंदोलन के दौरान दोनों की भूमिका किसी से छिपी नहीं है।

विनय कटियार इस बार भी इस मामले में आगे हैं लेकिन उनकी भी फिजा बदली हुई है। वह भी आडवाणी और जोशी की राह पर चल रहे हैं और लोगों से शांति की अपील कर रहे हैं।

छह दिसम्बर 1992 की घटना के दौरान देश की कमान गांधी परिवार के किसी नुमाइंदे के हाथ में न होकर पी. वी. नरसिम्हा राव के हाथ में थी ठीक उसी प्रकार इस बार भी देश की कमान गांधी परिवार के हाथ में न होकर राव मंत्रिमंडल में ही उनके वरिष्ठ सहयोगी रह चुके डा. मनमोहन सिंह के हाथों में है। यह दीगर बात है कि उनका कोई भी फैसला 10 जनपथ की हरी झंडी के बगैर नहीं होता है।

उत्तर प्रदेश में उस वक्त मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री थे इस बार उनकी चिर प्रतिद्वंद्वी मायावती सत्ता में हैं। उस वक्त मधुकर दत्तात्रेय देवरस के हाथों में संघ की कमान थी जबकि इस बार शांत व मृदु स्वभाव वाले मोहन भागवत के हाथों में उसकी कमान है। यहां भी पात्र बदले हुए हैं।

राम मंदिर का मुद्दा पिछले कुछ दशकों से राजनीतिक तौर पर मृतप्राय हो गया था। नफे-नुकसान के मद्देनजर राजनीति दल भी यह कहने लगे थे कि यह मुद्दा अब काम का नहीं रहा लेकिन 24 सितम्बर को अदालत के आने वाले फैसले के मद्देनजर देश के सभी राजनीतिक दलों की इस पर टकटकी लगी हुई है। किसी को इसमें अपना भविष्य संवरता दिख रहा है तो किसी को बिगड़ता। प्रधानमंत्री सहित तमाम राजनीतिक दल अदालत के फैसले के मद्देनजर जनता से संवैधानिक मयार्दाओं का पालन करने की अपील कर रहे हैं।

बहरहाल, मुद्दा वही है लेकिन इस बार परिस्थितियों के साथ-साथ पात्र भी बदले हुए हैं।

अदालत के फैसले के मद्देनजर भगवा संगठनों की कमान पूरी तरह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने अपने हाथ में थाम ली है। ठीक उसी तरह जिस प्रकार 1992 में राम मंदिर आंदोलन के दौरान उसने इसकी कमान अपने हाथों में थामी थी।

सूत्रों के मुताबिक अदालत का फैसला आने के दिन हिन्दुवादी संगठनों की ओर से साधु-संतों की 24 और 25 सितम्बर को दिल्ली में एक बैठक बुलाई गई है, जिसमें आगे की रणनीति तय होगी। संघ प्रमुख मोहन भागवत खुद उस रणनीति का खुलासा करेंगे।

संघ की कोशिश यह भी है कि ठीक उसी तरह एक नया नेतृत्व तैयार किया जाए जिस प्रकार राम मंदिर आंदोलन के दौरान नेताओं की एक फौज तैयार की गई थी। संघ के सूत्रों के मुताबिक वह इसकी रणनीति भी बना रहा है।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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