कैमरे से खामोशी को आवाज देने की अनूठी पहल
भिंड और मुरैना देश के उन 14 जिलों में शामिल हैं जहां लड़के-लड़कियों की संख्या के अनुपात में सबसे अधिक अंतर है। यहां प्रति 1000 लड़कों पर 850 से भी कम लड़कियां हैं।
गरीबी, शिक्षा की कमी और लिंग असमानता का सामना कर रहीं दोनों जिलों की लड़कियों को जीवन में आगे बढ़ने के लिए कड़ा संघर्ष करना पड़ता है। अक्सर उनकी आवाजें अंदर ही दबी रह जाती हैं और इसकी वजह यह है कि उनके पास ऐसा कोई मंच नहीं है जहां से वह अपनी भावनाओं को आवाज दे सकें। दूसरी ओर सामाजिक बाधाएं उन्हें स्कूल जाने के अलावा और किसी काम में सक्रियता से हिस्सा लेने से रोकती हैं और वे घरेलू कामकाज में ही उलझ कर रह जाती हैं।
अब इस थोपी गई खामोशी की बाधाओं को तोड़ने के लिए कैमरे का इस्तेमाल किया जा रहा है। कुछ दिनों के अंदर ही देश के सबसे पिछड़े यहां के गांवों की लड़कियां दिखा सकेंगी कि उनके लिए जीवन कितना कठिन है और वे लिंग असमानता के विषय में क्या सोचती हैं। साथ ही वे उन सामाजिक मुद्दों पर भी अपना मत रख सकेंगी जिन पर उनकी राय की किसी को परवाह नहीं होती।
इन बेआवाज लड़कियों को आवाज देने के एक अनूठे प्रयास के तहत यूनिसेफ और राज्य सरकार का महिला एवं बाल विकास विभाग ग्वालियर, भिंड और मुरैना की 30 युवा लड़कियों को फोटोग्राफी का प्रशिक्षण दे रहा है। दिल्ली के दो वरिष्ठ फोटोग्राफर प्रभाष रॉय और जगदीश यादव इन लड़कियों को प्रशिक्षित कर रहे हैं।
अगले कुछ दिनों में इन लड़कियों द्वारा ली गई तस्वीरों की एक प्रदर्शनी लगाने की योजना है। ये फोटोग्राफ या तस्वीरें उन स्कूलों में प्रदर्शित किए जाएंगे जहां ये लड़कियां पढ़ाई करती हैं।
ग्वालियर-चंबल क्षेत्र के सहायक आयुक्त अशोक शिवहरे ने 15 सितम्बर को ग्वालियर में फोटोग्राफी प्रशिक्षण की इस तीन दिवसीय कार्यशाला का शुभारंभ करने के बाद आईएएनएस से कहा, "इस तरह की पहल इन लड़कियों के सशक्तिकरण की दिशा में लंबा रास्ता तय करेंगी।"
प्रदेश स्थित यूनिसेफ कार्यालय के संचार विशेषज्ञ अनिल गुलाटी कहते हैं, "यह कार्यशाला बच्चों को फोटोग्राफी का इस्तेमाल करते हुए अपने विचारों को अभिव्यक्ति देने के अवसर प्रदान करने के लिए किए गए प्रयासों का एक हिस्सा है।"
उन्होंने कहा कि यह कार्यशाला बच्चों की भागीदारी को मंच उपलब्ध कराने की पहल है और इसके जरिए यह भी देखना है कि वे सहस्राब्दी विकास लक्ष्यों के विषय में क्या जानते हैं या उन्होंने इस बारे में क्या देखा-सुना है और जमीनी हकीकतें क्या हैं।
भिंड जिले के रबींद्रनाथ टैगोर स्कूल की कक्षा 10वीं की छात्रा प्रिया भदौरिया ने पहले प्रशिक्षण सत्र के बाद कहा, "मैंने इससे पहले किसी कैमरे को छूआ भी नहीं था। यह बहुत उत्साहजनक है। अब मैं जो महसूस करती हूं वह दिखा सकती हूं। हम कई समस्याओं का सामना करते हैं लेकिन उनके बारे में मुश्किल से ही किसी को बताते हैं। शायद फोटोग्राफी से हमें मदद मिलेगी।"
मुरैना के महात्मा लोचनदास स्कूल की 10वीं की छात्रा मोनिका श्रीवास्तव को विश्वास है कि वह अपने फोटोग्राफ्स के जरिए लिंग असमानता की समस्या को उभार सकेंगी। वह कहती हैं, "मैं कुछ कहूंगी तो हो सकता है कि दुनिया उस पर भरोसा न करें लेकिन तस्वीरों में दिखने वाले तथ्यों को कोई कैसे नकारेगा।"
राज्य महिला एवं बाल विकास विभाग के संयुक्त निदेशक सुरेश तोमर कहते हैं, "हम उम्मीद कर रहे हैं कि बच्चे सहस्राब्दी विकास लक्ष्यों को हकीकत में बदलने के लिए फोटोग्राफी कला का इस्तेमाल कर सकेंगे।"
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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