दलित कारसेवक की कथा

दलित कारसेवक की कथा

नारायण बारेठ

बीबीसी संवाददाता, जयपुर

अयोध्या में राम मंदिर पर फ़ैसले की घड़ी नज़दीक आई तो उसको याद आया वो भी एक हिंदू कारसेवक था और मंदिर के लिए अयोध्या तक गया था.

मगर अब वो महज़ एक दलित है, तब अयोध्या में विवादित ढांचा टूटा था, लेकिन विश्व हिंदू परिषद् के सक्रिय कार्यकर्ता रहे जयपुर ज़िले के चकवड़ा गांव के हरीशंकर बेरवा अपने गाँव लौटे और जो कुछ देखा उससे उनका दिल टूट गया.

उन्हें सहसा याद दिलाया गया कि वो महज़ एक दलित हैं, वो हिंदू तो हैं, मगर दर्जे से दोयम हैं.

इसीलिए टूटे हुए दिल के हरिशंकर कहते है, '' फिर मंदिर के लिए कार सेवा का आव्हान हुआ तो वो ख़ुद तो क्या कोई भी दलित अयोध्या का रुख़ नहीं करेगा.''

हरिशंकर कारसेवक के रूप में चकवड़ा से गए कोई 10 लोगों के जत्थे में अकेले दलित थे.

वो कहने लगे,'' हम वहाँ मर भी सकते थे, गोलियाँ चलीं कई लोग ज़ख़्मी हुए थे, पकड़े गए तो 15 दिन बुलंदशहर जेल में भी रहे, तब बताया गया कि हम सब हिंदू हैं, न कोई ऊंच है न नीच. पर ये सब फ़रेब था.''

हरिशंकर की ज़िंदगी में तब तूफ़ान आया जब गाँव के साझा तालाब में दलितों ने सदियों पुरानी उस परंपरा को बहुत सरल भाव से तोड़ने का प्रयास किया जिसमें दलित के लिए अलग घाट बना हुआ था.

उनका कहना था, " उस दिन 'सब हिंदू बराबर है' की मानस पर अंकित तस्वीर टुकड़े टुकड़े हो गई जब हम पर जुर्माना लगाया गया, अपमानित किया गया, हमले के लिए हिंदुओं की भीड़ जमा हुई और तालाब में दलितों के घाट से अलग पानी लेने पर गंभीर परिणामों की चेतावनी दी गई."

"उस दिन मेरा मन बार-बार ये ही पूछता रहा क्या हम हिंदू नहीं है? अगर हिंदू हैं तो फिर ये सलूक क्यों?" ये सवाल उठाते हुए हरिशंकर के चेहरे पर कई भाव चढे़ उतरे.

वो कहने लगे, ''एक विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ता के नाते मैं अभिभूत था. लगा अभी साधू संत आएंगे, अभी प्रवीण तोगड़िया जी आएंगे. हम उन तक गए, गुहार भी की. मगर दलित के लिए कौन बोलता? क्योंकि वो कहने के लिए हिंदू हैं.''

कभी हरिशंकर 'सौगंध राम की खाते हैं' के नारे लगाते थे, अब उनके घर में बने एक संकुचित से पूजा घर में राजस्थान के लोक देवता रामदेव, गौतम बुद्ध और अम्बेडकर सबसे बड़े भगवान हैं.

मैंने पूछा आरएसएस से कब से जुड़े हो? वो मुझे अतीत में ले गए, '' आरएसएस में बचपन से ही जाना शुरू किया. वहां हमें बताया गया कि पूरे समाज को समरस बनाना है. मुझे ये ठीक लगा. फिर मंदिर का मुद्दा आया. हमें विहिप ने बताया कि अपने हिंदुओं के मंदिर पर मुसलमानों ने क़ब्ज़ा कर लिया, उसे मुक्त कराना है. हम ये ही सोचकर गए कि सब हिंदू सामान है. सब भाई है.''

फिर ऐसा क्या हुआ कि वो अब विरोध में खड़े है.

हरिशंकर कहते हैं, '' जब तालाब से पानी की बात आई तो मैंने इनके व्यवहार में फ़र्क़ देखा. मैं विहिप के नेताओं के पास गया कि दलितों के साथ बुरा सलूक हो रहा है. मगर उन्होंने कोई रुचि नहीं ली. दलितों के साथ क़दम क़दम पर भेदभाव होता है. उन्हें मंदिर में नहीं जाने दिया जाता, उनकी शादियों में बारात पर हमले होते है. विवाह में बैंड बाजे नहीं बजाने देते. ये बात कई बार मैंने विहिप की बैठकों में उठाई. पर किसी ने रूचि नहीं ली.''

वो कहते हैं, '' वो सिर्फ़ हिंदू-मुसलमानों की बात करते हैं. मगर जब दलित के साथ ज़ुल्म की बात आती है तो वो चुप हो जाते हैं. हम पर विपत्ति आई तो गांव में विहिप समर्थक 50 लोग थे या तो वे ख़ामोश थे या भागीदार थे. मैंने विहिप वालों से कहा ये ठीक नहीं है. हम हिंदू धर्म से अलग हो जाएंगे.''

दूसरी ओर हिंदू संगठन कहते हैं कि इन दलितों को किसी ने बहका दिया है.

साधु-संत और धर्मग्रंथ कहते हैं कि न कोई ऊँचा है न कोई नीचा 'हरी को भजे सो हरी का होय.' मगर ये शायद ज़िंदगी का यथार्थ नहीं है.

न जाने क्यों जब भी कोई दलित मंदिर की देहरी चढ़ता है या फिर पोखर, तालाब, और कुएँ पर प्यास बुझाने के लिए हाथ बढ़ाता है, उसे उसका सामाजिक दर्जा याद दिलाया जाता है.

पर क्या आस्था और प्यास को ऊंच नीच में बांटा जा सकता है.

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