उप्र में इंसेफेलाइटिस के बाद अब इंट्रोवायरसेज का कहर

पूर्वी उत्तर प्रदेश में इस साल नौ सितंबर तक जहां आधिकारिक रूप से जापानी इन्सेफेलाइटिस से केवल 18 लोगों की मौत हुई वहीं इंट्रोवायरसेज विषाणु ने 234 जिंदगियों को लील लिया है। मरने वालों में ज्यादातर बच्चे हैं।

सबसे बड़ी चिंता यह है कि वैज्ञानिक अब तक इंट्रोवायरसेज की प्रकृति को पूरी तरह से समझ्झ नहीं पाए हैं। इसके चलते इस विषाणु पर नियंत्रण के लिए जापानी इन्सेफेलाइटिस की तरह वैक्सीन नहीं बनाई जा सकी।

जापानी इन्सेफेलाइटिस जहां मच्छर के काटने से फैलता है, वहीं इंट्रोवायरसेज पानी से फैलने वाला विषाणु है। यह बीमारी दूषित जल व गंदगी से फैलती है। इस बीमारी पर नियंत्रण के लिए कोई दवा और टीका उपलब्ध नहीं हुआ है। ऐसे में साफ सफाई रखकर ही इस बीमारी से बचा सकता है।

इंट्रोवायरसेज संक्रामक विषाणुओं का एक समूह होता है कि जो मरीज की आंत में रहकर उसके तंत्रिका तंत्र को क्षतिग्रस्त कर देता है।

दिमागी बुखार से पूर्वी उत्तर प्रदेश के गोरखपुर, कुशीनगर, देवरिया, बस्ती, संत कबीर नगर, सिद्धार्थनगर, बस्ती, महराजगंज सहित विभिन्न जिलों में हुई मौतों को एक्यूट इन्सेफेलाइटिस सिंड्रोम (एईएस) की श्रेणी में रख गया।

एईएस उन बीमारियों का समूह है, जिनके लक्षण इन्सेफेलाइटिस से मिलते हैं, लेकिन जांच में उनमें जापानी इन्सेफेलाइटिस के वायरस की पुष्टि नहीं होती। इनका कारण इंट्रोवायरसेज माना जाता है।

गोरखपुर स्थित बाबा राघव दास (बीआरडी) मेडिकल कॉलेज में बाल चिकित्सा विभाग के प्रमुख के. पी. कुशवाहा ने आईएएनएस को बताया कि इस साल इन्सेफेलाइटिस के लक्षण वाले 1,250 बच्चे भर्ती किये गये जिनमें जांच के बाद 139 बच्चों में जापानी इन्सेफेलाइटिस की पुष्टि हुई। अन्य के बारे में कहा गया कि वे एईएस से पीड़ित हैं।

उन्होंने बताया कि फिलहाल एईएस से पीड़ित 285 बच्चों का उपचार किया जा रहा है।

पूर्वी उत्तर प्रदेश में इन्सेफेलाइटिस के अनियंत्रित खतरे से निपटने के लिए बीआरडी मेडिकल कालेज में एक नोडल केंद्र बनाया गया है।

कुशवाहा कहते हैं कि इस संबंध में चल रहे शोध और अध्ययन से अब तक ये संकेत मिले हैं कि एईएस मामलों के लिए इंट्रोवायरसेज जिम्मेदार हो सकते हैं। अभी इन विषाणुओं की प्रकृति के बारे में पूरी तरह जानने के लिए काफी अध्ययन किया जाना बाकी है।

पुणे स्थित राष्ट्रीय विषाणु विज्ञान संस्थान (एनआईवी) ने दो साल पहले गोरखपुर में अपनी एक प्रयोगशाला स्थापित की। प्रयोगशाला के विशेषज्ञों ने भी इन्सेफेलाइटिस के तेज बुखार, बेहोशी और सिरदर्द जैसे लक्षणों वाले मरीजों, जिनमें जापानी इन्सेफेलाइटिस वायरस की पुष्टि नहीं हुई, की मौतों के लिए इंट्रोवायरसेज को जिम्मेदार ठहराया।

जानकारों का मानना है कि इंट्रोवायरसेज में उत्परिवर्तन दर तीव्र होना उनके बारे में अध्ययन को जटिल बना देता है इसलिए वर्तमान समय में इंट्रोवायरल संक्रमण के उपचार के लिए कोई विशिष्ट दवा या वैक्सीन उपलब्ध नहीं है।

गोरखपुर स्थित एक चिकित्सक व इन्सेफेलाइटिस उन्मूलक आंदोलन के मुख्य प्रचारक आर. एन. सिंह ने आईएएनएस को बताया कि केंद्र की सहायता से राज्य सरकार द्वारा इन्सेफेलाइटिस की रोकथाम के लिए चलाए गए टीकाकरण अभियान ने निश्चित रूप से इस पर काफी हद तक नियंत्रण किया है। लेकिन इंट्रोवायरसेज पर नियंत्रण पाने के लिए कोई वैक्सीन उपलब्ध नहीं है।

जापानी इन्सेफेलाइटिस के खिलाफ साल 2006 में पूर्वी उत्तर प्रदेश ने टीकाकरण अभियान चलाया था। इस साल नवंबर में टीकाकरण अभियान चलाया जाना है।

सिंह का कहना है कि इंट्रोवायरसेज का मुकाबला केवल साफ सफाई रखकर ही किया जा सकता है। ऐसा देखा गया है कि यह बीमारी आमतौर पर गरीब तबके के लोगों में होती है। उनमें साफ सफाई को लेकर इतनी जागरूकता नहीं रहती।

वह कहते हैं कि अगर सरकार प्रभावित क्षेत्रों में स्वच्छ पेयजल और मलमूत्र के निपटान की उचित व्यवस्था हो तो इन्ट्रोवायरसेज को काफी हद तक रोका जा सकता है। इंट्रोवायरसेज से निपटने के लिए जनता के बीच स्वच्छता के महत्व के प्रति जागरूकता अभियान चलाने की जरूरत है।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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