मंदिर या मस्जिद? हमें हर फैसला मंजूर...

लखनऊ। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच में विशेष खंडपीठ 24 सितंबर को अयोध्‍या में विवादित ढांचे पर अपना फैसला सुनाने जा रही है। ऐसे में एक बार फिर राजनीतिक पार्टियां देश की सांप्रदायिकता को ठेस पहुंचाने की फिराक में हैं, लेकिन जनता के मन में एक ही बात बार-बार उठ रही है- मंदिर या मस्जिद, जो भी बने, हमें हर फैसला मंजूर है...

मंदिर या मस्जिद? हमें हर फैसला मंजूर...

देश की जनता आज कल्‍याण सिंह जैसे नेताओं को यह अभी से बताना चाहती है कि अब वो मंदिर-मस्जिद के नाम पर होने वाली राजनीति से बहकने वाली नहीं है। आर्थिक मजबूती की ओर अग्रसर यह देश एक बार फिर 1992 के दंगों को दोबारा नहीं देखना चाहता। मामला चूंकि अयोध्‍या का है, तो उत्‍तर प्रदेश सबसे ज्‍यादा संवेदनशील राज्‍य है। विकास के पथ पर पहले ही पिछड़ चुका उत्‍तर प्रदेश अब और दंगे-फसाद सहन नहीं कर सकता।

राजनीतिक पार्टियों की क्‍या जिम्‍मेदारी

छह दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद ढहाये जोन के बाद हुए दंगों में हजारों घर तबाह हो गए। लाखों का जीवन आंसुओं में लीन हो गया, अंत में मिला क्‍या? हिन्‍दुओं और मुसलमानों के बीच कड़वाहटें। 18 साल बाद आज वो घाव लगभग पूरी तरह भर चुके हैं। आम मुसलमानों या आम हिन्‍दुओं ने इस मुद्दे पर बात करना तक बंद कर दिया है।

ऐसे में भाजपा से निष्‍कासित हो चुके जनक्रांति पार्टी के मुखिया कल्‍याण सिंह जैसे नेता अभी से राजनीतिक रोटियां सेकने में जुट गए हैं। जरा सोचिए होई कोर्ट द्वारा फैसले की तारीख सुनाए जाने से पहले ही उन्‍होंने राम मंदिर का राग अलापना शुरू कर दिया। वहीं भारतीय जनता पार्टी अपने हर वार्षिक आधिवेशन में राम मंदिर का मुद्दा उठाना नहीं भूलती।

देखा जाए तो 24 सितंबर को कोर्ट का फैसला आने के समय इन पार्टियों की यह नैतिक जिम्‍मेदारी बनती है कि वो भारतीय लोकतंत्र के दूसरे स्‍तंभ का मान रखें और उसके फैसले का स्‍वागत करें।

मीडिया की भूमिका अहम

इस समय देश में मीडिया की भूमिका भी काफी अहम है। 24 सितंबर तक किसी भी टीवी चैनल, अखबार या न्‍यूज़ वेबसाइट को ऐसी खबरें चलाने से बचना चाहिए, जिससे दंगे की आख भड़क सकती हो। यही नहीं मीडिया को हिन्‍दू या मुसलमान किसी के साथ पक्षपाती खबरों से भी दूरी बनानी होगी। खास तौर से उन टीवी चैनलों को जो टीआरपी बढ़ाने के लिए स्‍तरहीन हो जाते हैं।

लोगों से अपील

वैसे तो आम लोगों के बीच मंदिर-मस्जिद का मुद्दा काफी पुराना हो चुका है, लेकिन फिर भी इस महीने उन्‍हें किसी भी प्रकार की अफवाह से बचना होगा। हो सकता है लोग अपनी आपसी भड़ास निकालने के चक्‍कर में फिजूल की अफवाह उड़ा कर दंगे करा दें। यही नहीं लोगों को राजनेताओं के बहकावे में आने से भी बचना होगा। खास तौर से उत्‍तर प्रदेश के लोगों को इन बातों से दूर रहना होगा, क्‍योंकि उनका राज्‍य पहले ही काफी पिछड़ चुका है और अगर किसी प्रकार के दंगे-फसाद हुए, तो विकास के मामले में राज्‍य और ज्‍यादा पीछे चला जाएगा।

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